दु:ख की दुनिया भीतर है: स्मृतियों में पिता को ढूँढ़ना
हम जिस परिवेश और समय में बड़े होते रहे, उसमें पिता एक दूर के व्यक्ति बने रहे। जीवन के पन्ने सही गलत से परे खत्म होते गए और अब सोचती हूँ तो पिता से दोस्ती करने की इच्छा पनपने लगी है। कई-कई बार बहुत गहरे में मन हुआ पिता का मन जानने की। बीते दिनों एक दोस्त ने पिता पर एक बेहद सुंदर कविता लिखी, जिसे पढ़ते हुए, पिता को याद करते हुए अपने भीतर एक सुंदरता महसूस की; हालाँकि पिता से बात नहीं कर पाई।
कल ही एक किताब पढ़कर खत्म की। दु:ख की दुनिया भीतर है नामक इस किताब को लिखा है जे सुशील ने। इस किताब को पढ़ते हुए फिर से लगा कि फोन उठाऊँ और पिता से बात करूँ।
इस किताब ने मेरे भीतर क्या बदला, शायद नहीं बता सकती, पर इतना ज़रूर है कि इस किताब ने पिता से दोस्ती करने की मेरी इच्छा को और गाढ़ा किया। उन सख्त दीवारों के पीछे उस खिड़की को ढूँढने को उकसाया जहाँ से पिता को थोड़ा जाना जा सकता है।
इस किताब की दुनिया को मैं जानती हूँ। शायद यह भी एक वज़ह है कि इस किताब में चित्रित पिता का जीवन और उस परिवेश को लेकर एक निराशा, झुंझलाहट अपनी पूरी सच्चाई के साथ महसूस होती है। पर इससे बड़ी वज़ह यह लगती है कि यह लेखन बहुत ईमानदार है, जीवन की मानिंद सच्चा है, जिसे रंग पोतकर तैयार नहीं किया गया है।
हम सब कितने सारे ट्रॉमाज़ से निर्मित होते हैं, ऐसे ट्रॉमाज़ जिनकी हम पहचान भी नहीं करते। एक पिता जिसने अपने पिता को नहीं देखा और ताउम्र पिता को खा जाने वाली गाली उसके साथ जुड़ी रही। पिता जिसे अपनी ताकत पर भरोसा था, उसके छीजने पर उतना हताश नहीं होता, जितना उस समाज के धोखे पर बिखर जाता है, जिसे वह कभी छोड़ना नहीं चाहता था। हारे हुए पिता को देखना कितना मुश्किल दृश्य है और उससे भी मुश्किल हो जाता है उस दीवार को पार कर पाना जो पिता से चिहुँक कर गले नहीं मिलने देता। दीवार जिसे तोड़ने की कोशिश पिता ने नहीं की, तो हमने भी नहीं की।
हर वक़्त अजीब से गुस्से से भरी रहने वाली मैं इन दिनों यह समझने लगी हूँ कि ख़ालिस स्याह या सफेद नहीं होता जीवन। पिताओं की हिंसा यदि हमने देखी है तो उनके भीतर की किसी कोमलता को भी हमने किसी न किसी मोमेंट में ज़रूर महसूस किया होगा। मेरे लिए यह मौका उम्र का एक लंबा सफर तय करने के बाद आया। उस रोज़ को याद कर आज भी मेरी आंख भीग रही है, किसी तकलीफ से नहीं बल्कि इस एहसास से कि भयानक अंधेरे दिनों में धंसी डूबी मेरी तकलीफ को जब दुनिया मेरा किया धरा या मेरी भावुकता ठहरा रही थी, वह पुरुष सिर्फ मेरे होने की तसल्ली करने एक लंबा और मुश्किल सफर तय कर मेरे पास आया था।
“श्राद्ध कर्म संबंधी बातचीत के दौरान,
“समाज को भी तो देखना है” जैसे वाक्यों को सुनकर मेरे तन-बदन में आग
लग जाती थी। मैंने पाया कि भोज खाते हुए लोग कभी याद नहीं रखते कि यह मृत्यु का भोज
है। खुद भोजन करने के बाद, भोजन भर कर ले जाने के लिए लड़ते
हुए लोगों को देख कर कभी कभी लगता है कि कि क्या हम इसी अंत के लिए इस समाज में
लौटते हैं।”
मृत्यु के बाद की तमाम व्यवस्थाएँ मुझे मृत्यु का अपमान लगती हैं। मैं उन व्यवस्थाओं से खुद को अलग कर लेना चाहती हूँ, पर फिर वहाँ होने या न होने की उधेड़बुन। हम दुखों में दुखी होने वाले समाज नहीं है, हाँ उसकी नुमाइश करने वाले समाज ज़रूर हैं।
तमाम ग्लोरिफिकेशंस के दौर में गाँव भी अछूता नहीं है पर यह किताब भारतीय गाँवों की उस निर्मम दुनिया का भी ज़िक्र करती है जिसे वहाँ का यथार्थ जीकर ही समझा जा सकता है, दूर से दर्शन करने से नहीं। पिता का उस गाँव में वापिस लौटना और उस गाँव समाज का पिता के साथ का व्यवहार और इन सबके बीच पिता को कमज़ोर होते देखना... क्या यह भी एक वज़ह नहीं है कि अपना गाँव, अपनी ज़मीन जैसा कोई आकर्षण अब हमारे भीतर नहीं रह गया है?
किताब में ऐसे कितने ही ऐसे प्रसंग हैं जहाँ हमें हमारे पिता मिल जाते हैं, जूते खरीदने वाला प्रसंग हो, ज़मीन की बिक्री का प्रसंग हो या किसी सवाल पर हल्की सी मुस्कुराहट के साथ सवालों से मुँह फेरने वाला प्रसंग हो।
हमने हमेशा माँ बाप को अच्छी छवि में देखना तय किया है जबकि ऐसा होता नहीं है। वे भी इंसान होते हैं, अपनी सारी कमज़ोरियों के साथ। यह कितना बड़ा सच है जिसे हमें सीखना है। और यह भी सच है कि इसे सीखते हुए हमारे भीतर का प्यार नहीं सूखेगा, बल्कि माँ बाप और अपने लगेंगे, वह दूरी भी मिटेगी जो अमूमन हमारे बीच पनप आती है। जैसे इस किताब को पढते हुए हमें अपने पिता को प्यार करने का मन हो आता है, उनके जीवन को समझने का मन हो आता है, उनके साथ बैठकर रोने का मन करता है ताकि हम खुद को हल्का कर सकें और शायद पिता भी खुद को उस फ्रेम से निकाल सकें, जिसमें उन्होंने ख़ुद को जकड़ रखा है।

यह किताब तो नहीं पढ़ी, पर जितना आपका लिखा समझ में आया, इस किताब ने बहुत ही मर्म स्थान को पकड़ा है,,,बाकी आपने कहा ही है,,पिता की वजह अगर कोई पिता से जुड़ जाता है,,इससे कारगर कुछ और क्या ही होगा ।।भी
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