घर आख़िर किसे कहते हैं? - नाटक "घर के भीतर"
"घर बाहर जाने के लिए उतना नहीं होता जितना लौटने के लिए होता है।" दुनिया भर की परिभाषाएं होंगी घर को लेकर लेकिन मुझे विनोद कुमार शुक्ल की यह पंक्ति बेहद माकूल लगती है। हम सब घर तलाशते ही हैं, पर पता नहीं कितने अपना घर ढूंढ पाते हैं, जहां वे अपने सच्चे सेल्फ के साथ लौट सकें। जी हां, मेरे लिए घर वह ट्रेडिशनल स्पेस नहीं है जहां हायरार्की बहुत सम्मान के साथ अपनाई गई है। हमारे नाटक के डायरेक्टर आक्षित इस घर को मिनी सोसायटी के तौर पर सही ही रेफर करते हैं क्योंकि समाज में पैबस्त खूबसूरती और बदसलूकी दोनों के यहां मौजूद होने की पूरी संभावना होती है। घर के भीतर नाटक मेरे लिए बहुत अपना है, बहुत खास है अलग अलग वज़हों से; एक क्रिएटिव पार्ट के तौर पर किसी नाटक से जुड़ने का यह मेरा पहला मौका था, इस तरह यह मौका मेरे लिए खुद को चीन्हने का भी मौका रहा। और स्त्री देह जिसे समाज और परिवार कभी पवित्रता से, कभी पति को खुश करने, बच्चे पैदा करने से जोड़ते रहे हैं, उस देह को लेकर कोई स्त्री जब खुद कॉन्शस हो जाए तो क्या होता है, स्त्री का घर कौन सा होता है- मैं इन सवालों से जूझती रही हूँ और इस नाटक के...
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