उस गुलाबी फ्रॉक वाली लड़की को याद करते हुए ...!
मेरे सामने की सीट पर बैठी एक बच्ची मुस्कुरा रही है। मैं भी ढूंढ़ना चाहती हूं अपने भीतर की उस बच्ची को जो पापा की बुलेट के आगे बैठ जाया करती थी। वो उजले और गुलाबी फ्रॉक में अपनी छोटी छोटी आंखों में गाढ़ा सा काजल लगाई हुई लड़की उस बची हुई तस्वीर के मार्फत मुझे आज भी याद है।
आसमान को हम कितना भी क्यों न ताकें, ज़मीन ही हमें ठिकाना देती और ऊंचाई भी तो ज़मीन से ही तय होती है न। मैं बीते हुए समय को अपना आज नहीं बनाना चाहती पर बीते हुए किसी भी समय को मिटाने की कोशिश करना सिर्फ उस समय के साथ ज़्यादिती करना नहीं बल्कि खुद के साथ भी ज़्यादिती करना है।
ज़िन्दगी के गणित में यों तो फेल ही रही हूं हमेशा। पर किताबों का गणित सीखने में उस पापा की ही सिखाइश थी। 100 में 44 नंबर लाने पर पड़ी डांट तक तो गणित सबसे मुश्किल विषयों में ही रहा था। हमने खूब सारे चक्रवृद्धि ब्याज के सवाल बनाए पर बहुत सारी जगहों पर शायद हम मूलधन भी नहीं चुका सके।
मुझे नहीं पता सफल होने की ज़िद पाले रखना कितना सही है लगातार मिली असफलताओं के बाद। मैं कौन होती हूं किसी को गलत और सही के तराज़ू पर तोलने वाली। मैं खुद हारने से डरती हूं जबकि हार की सही सही परिभाषा भी नहीं जानती। इसलिए किसी अपने की आंख में हार देखना भी मुझे हरा देता है।
मैं उनकी जीत को नहीं समझ पाती, मैं शायद उस ज़िद को भी नहीं समझ पाती पर उनकी थकान को समझ पाती हूं और यह थकान मुझे बेबस करती है।
गणित की किताबों वाला हिसाब तो फिर भी पिता की सिखाइश से अब कुछ हद तक सीख गई हूँ पर ज़िन्दगी के गणित में मैं आज भी कच्ची ही हूँ और इसे मैंने स्वीकार भी कर लिया है। पर कुछ सवाल हैं जिसे मैं यकीनन हल करना चाहती हूं। मुझे किसी प्रमेय को नहीं साबित करना, न ही लूडो के खेल वाले छक्के को उछाल छह आने की संभावनाओं को तलाशना है, वैसे भी ज़िंदगी में हमेशा छह आने की संभावना होती कहाँ है। पर, उम्र की सीढ़ियाँ चढ़ते चढ़ते, ज़िंदगी जीने की ख्वाहिश और उसे न जी पाने की कसक के बीच ऊबड़ खाबड़ जीवन से थकी मैं उस बच्ची को ज़रूर तलाशना चाहती हूँ जो अपने पापा की बुलेट के आगे बैठी मुस्कुरा रही है।
आसमान में उड़ते हुए भी मुझे अपने गांव का वह दुआर ही याद आ रहा है जहां ईया (दादी) के चले जाने के बाद कभी नहीं गई। मुझे हर वो जगहें याद आ रही हैं जो हमारे जीवन से खोती जा रही हैं, मुझे वे शब्द भी याद आ रहे हैं जो हमारी भाषा की डिक्शनरी से गायब होते जा रहे हैं। मेरी आंखें इस गुमशुदगी से छलछला उठी हैं और तभी मेरे सामने वाली बच्ची मुस्कुराने लगती है।
मुझे उन गायब होती जगहों, उन गुमशुदा होते शब्दों को ढूंढ़ना है, उस गुम हुई तस्वीर को ही नहीं, उस अहसास को भी ढूंढ़ना है और खुद को भी...!!


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