फ़िल्म जो देखी जानी चाहिए: सुपर बॉयज़ ऑफ़ मालेगांव

 


मैं किसी सुपरमैन को नहीं जानती और न ही इस देश  की भौगोलिक चौहद्दी के भीतर कहीं मौजूद मालेगांव को कभी देखा है मैंने। पर इन दोनों शब्दों के तकरीबन मेल से बनी फ़िल्म को जब देखने गई तो लगा कि यह फ़िल्म मुझे और मैं इस फ़िल्म को पहचान रही हूं।                                                                          

एक झक्क साफ़ आसमान से ढंकी एक सुंदर खुली सड़क से कहानी की शुरुआत होती है। आसमान जो लुभाता है, खींचता है अपनी ओर और भर लेता है हर किसी को अपनी बांहों में। ऐसे ही आसमान में उड़ने की ख़ाहिश पाले शफ़ीक। यह ख़ाहिश भी पहचानी है और इसे पालने वाला शफ़ीक भी हम सबके लिए अजनबी कहां ही है।

कलाएं हमें बदलती हैं और साहस भी देती हैं, सपना देखना भी सिखाती है; मैं तो यकीन करती हूँ। यह कहानी और यह फ़िल्म सिर्फ़ सपना देखने भर की कहानी नहीं है, हार जाने की बेकली भी है यहां और चमचमाती दुनिया के पीछे के ठिगने लोग भी इस कहानी में मौजूद हैं।


 


नफ़रतों को चमकती भाषा का मुलम्मा चढ़ा कर या फ़िर कलात्मक जादूगरी की चादर से ढक कर या फ़िर कहानी के अभाव में बस शोर शराबे की चकाचौंध में या कि pretentious कहानी परोसे जाने के दौर में यह एक ऐसा सिनेमा है जो हौसला देता है, मोहब्बत का बारीक रेशा थमाता है, जो आखिर तक आपकी आँखों को भर जाता है।


यह कहानी बताती है, मुहब्बत के बारे में, जुनून के बारे में, दीवानगी के बारे में, इन सबके बीच मन में आ जाने वाले मानवीय कसैलेपन के बारे में। यह कहानी बड़ी ही सहजता से बहती हुई बढ़ती जाती है और उसका यह बहाव ही सबसे खूबसूरत है।

हालांकि यह भी लगा कि कुछ रिश्ते और एक्सप्लोर किए जा सकते थे, संभावनाएं तो वैसे भी बची रहती ही हैं, पर यह कहानी अपने कहन की ईमानदारी, अपने किरदारों की सांस लेती ज़िंदगी, जहां सांस उखड़ती भी है, से मन मोहती है जहां कोलैबोरेशन की प्रक्रिया में किसी एक के आगे बढ़ जाने की ख़लिश भी बाकियों में मौजूद है और उसी सुफ़ेद आकाश में उड़ने की शफ़ीक की ख़ाहिश को कल्पनाशीलता से सिरजी गई कहानी में मुकम्मल करने का दोस्ताना जज़्बा भी है।

सबको अपनी पहली मुहब्बत कहां मिलती है?, कहानी में मिलावट नहीं की जानी चाहिए। कहानी तो ज़िंदा और असल दुनिया और उसके लोगों की ही कही जानी चाहिए। जैसे बेहद मामूली पर ज़िंदा संवादों से भरी यह कहानी देखी जानी चाहिए;


कुछ तो उस साहस को बटोरने के लिए जिसकी दरकार पड़ेगी उन सपनों के पास जाने के लिए जिसे हमने तहा कर कहीं रख दिया है, यह सीखने के लिए भी लेखक की क्या भूमिका है ऐसे कलात्मक कार्यों में, और कि हर किसी को उसका ड्यू क्रेडिट मिलना ही चाहिए और कुछ इसलिए भी कि कहानी तो ज़िंदा और असली लोगों की देखी, सुनी जानी ही चाहिए।

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