सफ़ेदा की लॉटरी



लॉटरी जो अमूमन अमीर हो जाने की चाहनाओं से जुड़े ईवेंट के रूप में जानी जाती है, वह किसी बर्बर हत्या से जुड़ी हो सकती है- यह किसी के ख्याल में भी नहीं आता है। पर, इसी ख्याल को लेकर शर्ली जैक्सन ने 1948 में द लॉटरी नाम से एक कहानी लिखी। हालाँकि यह कहानी सिर्फ ख्याल पर आधारित नहीं है बल्कि समाज में परंपराओं के नाम पर शामिल उन क्रूरताओं को सामने रखती है, जिन्हें समाज ने अलग अलग भव्य आवरणों के तहत न सिर्फ स्वीकार कर लिया है बल्कि सेलिब्रेट भी करता है। इसी कहानी को आधार बनाकर अदर थिएटर, भोपाल द्वारा एक नाट्य प्रस्तुति तैयार की गई- आज लॉटरी का दिन है

बच्चों के मार्फ़त उस क्रूर परंपरा को याद करने और उस पर विचार करने का एक सुचिंतित प्रयास है: आज लॉटरी का दिन है। यह प्रयास अपने ट्रीटमेंट में नया भी है क्योंकि यह प्रस्तुति कहानी में घटित ईवेंट को आने वाले समय में बच्चों के ज़रिए याद करती है। इस प्रस्तुति में सफ़ेदा नाम का एक काल्पनिक कस्बा है जिसका होना किसी भी देशकाल में संभव है। इस सफ़ेदा की एक महान परंपरा है- लॉटरी। इस सफ़ेदा के अपने अष्टवचन हैं जिनकी घुट्टी पिला कर यहाँ के रहवासियों की स्मृति व नैतिकताओं को तैयार किया गया है। इन अष्टवचनों को आप उन तमाम नारों के संदर्भ में समझ सकते हैं जिनके ग्लोरिफिकेशन के साथ सच्चाई को छुपाया/ दबाया जाता है।

बीते दिनों एक इंटरव्यू देख रही थी जिसमें वरुण ग्रोवर ने बड़ी अच्छी बात कही कि यदि लेखक, निर्देशक का मोरल कम्पास सही और स्पष्ट हो तो कहानी को डिफेंड करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। बहरहाल इसी नुक्ते से, मैं आज लॉटरी का दिन है की रचना-प्रक्रिया और फिर उसकी प्रस्तुति को याद कर रही हूँ। चूँकि मैं खुद इस रचना प्रक्रिया से जुड़ी रही हूँ तो बहुत ईमानदारी से यह बात कही जा सकती है कि इसके निर्देशक का मोरल कम्पास बिलकुल सही जगह पर रहा है। निर्देशक अविजित सोलंकी की कहानी को कहने की कला और समझाइश ने इस कहानी को दिनांक 03 जनवरी 2024 को शहीद भवन में हुई आज लॉटरी का दिन है की नाट्य प्रस्तुति के रूप में संभव बनाया।

कहानी शब्द से निकलकर जब मंच पर पहुँचती है तो उसमें एक अलग जीवन जुड़ जाता है। अभय, रोशनी, यश, मिहिर, कोमल, हिमानी, कार्तिक और अमृता- इन आठ बच्चों के ज़रिए सामान्य बना दी गई लॉटरी की हिंसक परंपरा और उसमें भी किए गए प्रतिरोध के स्वर को अष्टवचनों के शोर में दबा दिए जाने और उसे याद रखने की ज़रूरत को यह प्रस्तुति बखूबी दर्शाती है। 

शब्दों से प्रस्तुति तक की इस यात्रा में निर्देशक का पर्स्पेक्टिव बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। मूल कहानी जहाँ victim के “यह सही नहीं है, यह गलत है” के विरोध और उसके बाद उसे अनसुना कर उसकी हत्या की सामाजिक परंपरा के निर्वहन के संकेत पर खत्म होती है। वहीं यह नाट्य प्रस्तुति इससे आगे बढ़कर कुछ बेहद ज़रूरी सवाल खड़ा करती है, जो कि विरोध को समाज द्वारा दबा दिए जाने को लेकर है, और यह भी कि हम गलत को तब तक गलत क्यों नहीं कहते जब तक हमारा खुद का नम्बर न आ जाए। इन सवालों के साथ यह प्रस्तुति और अधिक प्रासंगिक और ज़रूरी बन जाती है।

प्रस्तुति के दौरान लॉटरी का बक्सा दर्शकों में एक कौतूहल बनाए रखता है। कहानी की शुरुआत जहाँ इन आठों किरदारों द्वारा अपने जीवन की बाल सुलभ मासूम स्मृतियों को याद करने से होती है, वहीं इन किरदारों के मोनोलॉग्स के ज़रिए दर्शक उनके एकांत में भी प्रवेश कर पाते हैं। और आखिर में उस दबा दिए गए विरोध के स्वर को ढूंढने के क्रम में हिंसा का अनावरण होता है। लेकिन, बच्चों की कहानी को हिंसा पर समाप्त न करने के ज़िम्मेदाराना टेक के साथ यह प्रस्तुति उस लॉटरी के बक्से को गायब करने के इरादे के साथ खत्म होती है। हम इसे उस हिंसात्मक परंपरा को खत्म करने के इरादे के रूप में भी देख सकते हैं।



         
नाटक में संगीत और प्रकाश संयोजन की सुंदर कलात्मक व्यवस्था ने अनुभूतियों को गाढ़ा और असरदार बनाने में सहयोग किया। पूरी प्रस्तुति प्रक्रिया पर बहुत विस्तार से बात की जा सकती है। पर अभी बस इतना कि 40-42 दिनों की यह पूरी प्रक्रिया लोकतांत्रिक और समावेशी रही है। यह  सच है कि ये दोनों प्रवृत्तियाँ हर व्यक्ति, समाज में होनी ही चाहिए, बावज़ूद इसके इसे मेंशन किया जाना इसलिए भी ज़रूरी है कि ये प्रवृत्तियाँ व्यवहार स्तर पर दुर्लभ हैं। किसी भी कोलैबरेटिव प्रक्रिया में चँकि बहुत सारे लोग जुड़े होते हैं, बिखराव की संभावना भी उतनी ही होती है। पर ऐसी तमाम संभावनाओं के बीच कोलैबरेशन की सुंदरता को निकाल लेना यकीनन निर्देशक की सफलता होती है। 

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