Journey towards Light !
It was not an easy journey indeed!
I am not sure whether this journey is over or I have come out of it. But yes, I have brought myself on the way of betterment. I have gathered the courage to talk about it, seeing that the last few months I could barely even speak.
इस पूरी जर्नी में शायद खुद को ही जाना है और थोड़ा बहुत ख़ुद के आस पास को भी। कुछ लोग थे, जिन्होंने मुझे बहुत साहस और उम्मीद दी, मेरे डरा देने वाले अंधेरे दिनों में।
ये वो समय था कि कोई पूछता कैसी हो, मैं रो पड़ती, कोई मेरे स्टेटस पर फूल भेज देता और मैं रो पड़ती।
कई कई दिन नींद नहीं आई। मन भटकाने की बहुत कोशिश की, पर फिर रो पड़ती। एंज़ायटी इतनी बढ़ जाती कि सांस लेना मुश्किल हो जाता।
इस जर्नी में एक दोस्त बना जिससे मुलाक़ात तो क्या, फ़ोन पर भी कभी बात नहीं हुई। शायद वो इस दुख को पहचानता था। एक दिन मैंने किसी पन्ने पर लिखा था-
"एक दिन उस अनमिले दोस्त ने कहा कोई दुख का टुकड़ा फंस गया होगा, जो तुम्हें बार बार चुभ रहा है, मैंने कहा मैं ही दुख हूँ।"
उस अनमिले दोस्त के बार बार कहने पर मदद लेने का साहस बटोर सकी। शायद वो दोस्त इस तकलीफ को पहचानता था।
हमेशा सोचती रही क्या यह अनमिला दोस्त वाकई मेरी मदद कर सकता है। मैं ठीक होना चाहती थी, मैं ऐसे बीतना नहीं चाहती थी। आज कह सकती हूं कि उस दोस्त ने बहुत मदद की।
मुश्किल था, बहुत हेल्प नहीं मिलने पर दवाइयों का सिलसिला शुरू हुआ, डर लगा, सेकंड ओपिनियन के लिए जब गवर्नमेंट हॉस्पिटल गई तो वो अनुभव भी शुरुआत में साहस देने वाला नहीं था। पर वहां भी डॉक्टर ने दवाइयों की ज़रूरत बताई। और दवा लेना तो और मुश्किल अनुभव था। हर दुकान में जाती, पर्ची दिखाती, वो पहले पर्ची देखते, फिर मुझे और फिर मना कर देते, कम से कम 15 जगहों पर यही अनुभव रहा। 16वीं जगह ज्यों थोड़ी राहत मिली, I totally broke down. अंकल ने बड़े प्यार से कहा इसमें एंबेरेस होने की ज़रूरत नहीं है , हो जाता है सेंसिटिव लोगों के साथ, डॉक्टर ने जब बोला है तो ज़रूरत होगी आपको। और दवा पकड़ते हुए उन्होंने कहा - All the Best. और मैं फूट फूट कर रोई।
बहुत सारे अनुभव हैं।
कुछ प्यारे लोग मिलते रहे जिन्होंने खोने नहीं दिया मुझे। मेरे जवाब नहीं देने पर भी उन्होने साथ नहीं छोड़ा। एक जेएनयू में बना छोटा भाई जो नियमित मुझे कहता रहा कि दीदी जल्दी ठीक होना है, बहुत सारी कविताएं लिखनी हैं, एक बहुत प्यारी लड़की जो इस दौर से गुज़र चुकी थी, मुझे हौसला देती रही। एक बहुत सीनियर प्रोफेसर जिनसे इसी उदासी के क्रम में दोस्ती हुई, उनकी बातें अंधेरे में खिड़कियां बनी, छोटी थी वे खिड़कियां बेशक, कई दफे बंद भी हो जाती, पर जब अंधेरा गहराने लगता, फिर अचानक से वो खिड़की खुल जाती।
मेरी यह यात्रा ज़ारी है, दवाएं ज़ारी हैं, डिजिनेस रहती है, पर रोना कम हुआ है, बात कर पा रही हूं, थोड़ा ही सही, तो शायद बेहतर ही है और इसलिए अब उम्मीद आने लगी है थोड़ी थोड़ी।
मैने सीखा है अपनी इस यात्रा में कि हम सबको अपने व्यवहार में और संजीदा और भाषा में और ज़िम्मेदार होने की जरूरत है। हमें नहीं पता होता कि हमारी कोई हरकत, हमारे कुछ शब्द किसी का कितना नुकसान कर सकते हैं, वो डैमेज दिखते नहीं हैं, और जब दिखते हैं तो बहुत देर हो चुकी होती है।
हमने जिन चीजों को नॉर्मल किया हुआ है वे नॉर्मल नहीं हैं, किसी को पुल डाउन करना (किसी भी लिहाज़ से) कतई नॉर्मल नहीं है।
मैं जानती हूं कि उदासी किसी को आकर्षित नहीं करती and this is totally humane. पर जो उदास है उसे अतिरिक्त सेंसिटिविटी की ज़रूरत है, और वह अपनी तरह से उसे मांग भी रहा होता है, हमें उसे सुनने और समझने की ज़रूरत है। 'तुम तो ऐसी ही हो, सोचती ज्यादा हो, कुछ नहीं हुआ है'- ऐसी बातें हेल्प नहीं करतीं, आपका होना हेल्प करता है, सुना जाना हेल्प करता है।
Don't pull any one down, because this will damage the person who is suffering even more. Try to understand that their suffering, their trauma, is valid; their pain is real.
It is good that we are talking about Mental Health these days but this is not enough. What is more important is to understand it and create a support System around us.
Please listen, try to be empathetic. And trust me, by doing this we not only help the person who is suffering but we help ourselves too and become a better person.


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