जीवन को करीब से दर्शाते नाटक ‘अधान्तर- अभी रात बाकी है’ की प्रस्तुति पर एक प्रेक्षकीय टिप्पणी
दो दिन पहले टैगोर थिएटर, चंडीगढ़ में एक नाटक खेला गया जिसका नाम था अधान्तर- अभी रात बाकी है। यह नाटक मूलतः जयंत पवार द्वारा मराठी में अधान्तर नाम से ही लिखा गया है। कैलाश सेंगर द्वारा किए गए इसके हिन्दी अनुवाद अभी रात बाकी है को इस नाट्य प्रस्तुति का आधार बनाया गया। इस नाटक की दो प्रस्तुतियाँ हुई। दर्शकों की संख्या और उनके हाव-भाव से इस नाटक को सफल माना जा सकता है।
चूंकि मैंने नाटक की दोनों प्रस्तुतियों को देखा है इसलिए उस पर बात तो करूंगी ही उससे पहले नाटक के समाप्त हो जाने पर टीम के साथ हुए दर्शकों के छोटे से संवाद पर बात करना चाहूंगी। एक हिस्सा जो मेरे भीतर अभी तक रह गया है वह नाटक के निर्देशक सार्थक द्वारा कही गई बात थी कि- वे कुछ देने नहीं आए हैं बल्कि सिर्फ एक कहानी दिखाने आए हैं। बहुत स्पष्टता के साथ उन्होंने यह बात कही थी। हालांकि उनकी यह बात एक दर्शक के सवाल के जवाब में आई थी कि आपने इस नाटक में कहीं पर भी, किसी भी रूप में आदर्श जैसी कुछ सुंदर स्थिति क्यों नहीं दिखाई।
निर्देशक का अपना जवाब था जो उन्होंने उस वक़्त सबके साथ साझा किया पर 'कला जीवन के लिए' की पक्षधर मैं निज़ी तौर पर इस बात में यकीन करती हूँ कि कला अपने हर माध्यम में समाज को बेहतरी की ओर बदलने का एक मजबूत औज़ार है।
अब रही नाटक की बात : नाटक अपनी प्रस्तुति के ज़रिए एक कहानी तो कह ही रहा था और उस कहानी के माध्यम से, उस कहानी के किरदारों के माध्यम से एक साथ कई जीवन को दिखा रहा था और वह भी बिना कुछ छिपाए, बिना ढंके। मंटो याद आए उस वक़्त कि समाज यदि नंगा है तो उसे कपड़े पहनाने की ज़िम्मेदारी कलाकार की नहीं है। नाटक अपने कथ्य में कितना भी यथार्थवादी क्यों न हो, उसकी प्रस्तुति के यथार्थवादी होने की ज़िम्मेदारी नाटक को खेलने वाली पूरी टीम की होती है, इसलिए इसे सामूहिक कला भी कह सकते हैं और इस बात को नाटक के निर्देशक द्वारा भी बड़ी ईमानदारी से आखिर में स्वीकार किया गया। नाटक को यथार्थवादी बनाने में किरदारों के अभिनय की भूमिका तो थी ही, पर नाटक के पार्श्व में जुटी टीम की मेहनत भी मुखर होकर दिख रही थी।
तीन बेटे, एक बेटी, उसके पति, माँ और दिवंगत पिता वाले एक परिवार की कहानी कहता यह नाटक दरअसल जीवन की तल्खियों की कहानी कहता है, जहां हर किरदार के जीवन की अपनी कुंठाएँ हैं, हताशाएँ हैं। नाटक की प्रस्तुति की अच्छी बात यह थी कि इन नकारात्मक भावों को कहीं भी रोमैंटिसाइज़ नहीं किया गया वरन उन्हें इस तरीके से दिखाया गया कि अपनी जद्दोज़हद से जूझता हर किरदार सच्चा लगा। गालियां इस समाज का सच हैं, माँ, बहन की गालियां देता यह समाज तनिक ठहर कर सोचता नहीं है कि वह क्या कह रहा है? हमने अपने कहे को सुनना वैसे भी छोड़ ही दिया है और यह सच्चाई है जो इस नाटक की प्रस्तुति में बड़े सलीके से उभर कर आई। स्त्री को कुछ नहीं आंकना इस तथाकथित सभ्य (?) समाज की सच्चाई है, बहन-बेटी को अपनी तथाकथित इज्ज़त (?) से जोड़ते हुए उसे अपनी संपत्ति समझना इस समाज की ही सच्चाई है जिसे इस नाटक की प्रस्तुति में उतनी ही इंटेंसिटी के साथ दिखाया गया है।
हर किरदार ने कमोबेश अपनी भूमिका का कुशल निर्वहन किया है परंतु नरू के किरदार ने, नाटक की भाषा में कहूँ तो, अपनी दैहिक (आंगिक/ body language) और वाचिक अभिनय से बेहद प्रभावी असर छोड़ा है मेरे भीतर के दर्शक के अंदर। माँ और बहन मंजू के किरदार भी काफी प्रभावी रहे हैं अपने अभिनय में। हालांकि माँ के वाचिक अभिनय में शुरुआत में जिस मराठी भाषा का पुट मौजूद था, वह बीच में कहीं खो गया पर माँ का संघर्ष बखूबी उसके आंगिक अभिनय के ज़रिए दर्शकों तक पहुंचता रहा। मोहन जो इस नाटक का एक महत्वपूर्ण किरदार है और जो लगभग पूरे समय सेट पर मौजूद रहता है, उसकी हरकतें बेहद प्रभावी रहीं पूरे नाटक में। एक खालीपन जो उसके जीवन में मौजूद है, उसे गहन अभिनय के ज़रिए बखूबी दर्शाया है अदाकार ने। हाँ भाषा पर शायद थोड़ा और काम करने की ज़रूरत थी। नाटक को पहली बार देखते हुए आखिरी दृश्य में बहन मंजू के पति राणे के बर्ताव में जो निरपेक्षता थी एक किस्म की, वह दर्शकों को यकीन करने से रोक रही थी, या कहूँ कि वह निरपेक्षता या तटस्थता पूरी कहानी के रियलिज़्म के अनुरूप नहीं थी। पर एक ही घंटे के बाद खेले गए नाटक की दूसरी प्रस्तुति में उसी राणे ने उसी दृश्य में अपने आंगिक अभिनय से बिना बोले गहरा असर पैदा किया। तीन किरदार जिनपर अभी बात नहीं की गई है उनमें से एक है- परिवार का बड़ा बेटा बाबा जिसे लगता है कि वह बेहद आदर्शवादी है पर उसका व्यवहार अपने परिवार के भीतर बेहद पितृसत्तात्मक और संवेदनशून्य है- हालांकि मुझे लगा कि यह किरदार बेहद जटिल और पेचीदा हो सकता था पर अभिनय में वह जटिलता बिलकुल दिखाई नहीं देती, जो खटकती है और नाटक के पूरे रिद्म को भी प्रभावित करती है। दूसरा किरदार बटर का है जिसे नरू का दोस्त और शागिर्द कहा जा सकता है, उसकी भूमिका छोटी है पर जो बात खटकती है वह यह कि पूरे नाटक में उसने नरू की माँ को माँ कह कर संबोधित किया है, परंतु आखिरी दृश्य से थोड़ा पहले वह ‘नरू की माँ’ कहता लगभग बदहवास सा प्रवेश करता है और इस अलग संबोधन के पीछे कोई मोटिव भी दर्शकों के सामने स्पष्ट नहीं हो पाता है। एक और किरदार जो मामी का है उसकी एंट्री नाटक में एक रिलीफ़ के तौर पर होती है पर यह किरदार भी नाटक में ज्यादा कुछ जोड़ता नज़र नहीं आता, सिवाय मोहन के चरित्र के एक पक्ष को उजागर करने के।
एक और बात जो मुझे खटकी वह थी नाटक की पहली प्रस्तुति के बाद नाटक की टीम को इंट्रोड्यूस नहीं कराया जाना। मैं समझ पा रही हूँ कि दोनों प्रस्तुतियों के बीच समय बहुत कम था लेकिन चूंकि दोनों प्रस्तुतियों के दर्शक अलग होने थे और यह तो ज़ाहिर सी बात थी। इसलिए पहली प्रस्तुति के दर्शकों से नाटक की टीम का परिचय न हो पाना मुझे एक किस्म की ज़्यादिती लगी जिसने मुझे थोड़ा सा असहज किया।
अशेष शुभकामनाओं के साथ,
एक सामान्य सी दर्शक- डॉ. स्वाती




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