आज
उदास थीं,
समुन्दर की लहरें
गायब थी
उनकी खिलखिलाहट...
इत्तिला किसने की
उन्हें
रूठे अहसासों की
मैं न कहती थी,
है कोई नाता अवस्स
हमसे इन लहरों का
कितना हँसा करते थे तुम
औ तुम्हारी उस हँसी की चमक
छलक उठती थी इन लहरों पर
रूठे अहसासों को,
समुन्दर में देखना
नहीं भाता तनिक भी,
कभी आना जो तुम इस ओर
इन्हें अपनी थोड़ी सी हँसी दे जाना...
उदास थीं,
समुन्दर की लहरें
गायब थी
उनकी खिलखिलाहट...
इत्तिला किसने की
उन्हें
रूठे अहसासों की
मैं न कहती थी,
है कोई नाता अवस्स
हमसे इन लहरों का
कितना हँसा करते थे तुम
औ तुम्हारी उस हँसी की चमक
छलक उठती थी इन लहरों पर
रूठे अहसासों को,
समुन्दर में देखना
नहीं भाता तनिक भी,
कभी आना जो तुम इस ओर
इन्हें अपनी थोड़ी सी हँसी दे जाना...


सुन्दर कविता दी
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