खेलने के लिए बहुत सारे खेल हैं मेरे दोस्त, तुमने चुना किसी की निर्दोष भावनाओं से खेलना...!!
प्यार से रहना किसे कहते हैं? किसी को स्पेस देना किसे कहें। गलतियाँ क्या होती हैं? जो लोग गलतियों को सहज मान जीते हैं.. उनकी गलतियों से प्रभावित आहत मन क्या करे... क्या चुप हो अकेले में आँसू बहाए, क्या सब कुछ भूल जाए... कुछ जख्म गहरे होते हैं, जिन्हें भुला पाना उतना सहज नहीं होता जितना सहज है तुम्हारे लिए किसी का दिल दुखाना... ऐसा नहीं है तकलीफों के साथ रहना किसी को अच्छा लगता है। हर कोई खुश रहना चाहता है, मुस्कुराना चाहता है। वह भी ऐसी ही थी, उसे हँसना अच्छा लगता था, खिलखिलाना पसन्द था खूब उसे, उसकी आदतों में शुमार थी उसकी प्यारी सी खिलखिलाहट, जिसकी तारीफ बहुतों ने की थी। तुमने भी तो यही कहा था न..'Lively' 'ज़िन्दादिल'-यही तर्जुमा होगा न इसका.. और ये तो तुम भी जानते हो कि तुम्हारी तरह नकली बन के तुमसे कभी नहीं मिली थी वह.. तुम्हारे लिए दूसरों की भावनाएँ खेल या कि तुम्हारे मनोरंजन का ज़रिया हो सकती हैं। पर जिनके लिए भावनाएँ सबसे ऊपर होती हैं न, उनका तुम्हारे इस खेल में टूट जाना बहुत ही सहज है और यह सहजता वैसी ही है, जैसी कि वह खुद थी.. पता है शायद मैं कुछ नहीं लिखती, शायद उस तकलीफ को पूरी तरह लिख पाना सम्भव भी नहीं है, जिसे जिया है उसने तुम्हारे साथ.. पर जिस दिन उसके भरोसे को तुमने उसकी गलती कहा था न, उस दिन वह आई थी मेरे पास, उसकी आँखों में मासूम हँसी की जगह पीड़ा थी, ठगे जाने की, चोट खाने की.. तभी लगा कि कहना बहुत ज़रूरी है, यह कहना उसके साथ-साथ मेरे होने के लिए भी ज़रूरी था.. जिस दिन तुमने उससे यह कहा था न कि तुम्हारे साथ तो कोई खुश रह ही नहीं सकता, उस दिन से लगातार सोच रही हूँ कि क्यों कहा तुमने ऐसा.. उसकी ज़िन्दगी में अचानक से आने वाले तुम, या कि उसकी ज़िन्दगी को दुर्घटनाग्रस्त बनाने वाले तुम.. अपने हर मैसेज, अपने हर मेल में वह सिर्फ यही कहती रही कि ईमानदारी मेरे लिए बहुत ज़रूरी है, मैं शब्दों की ज़िम्मेदारी को बहुत बड़ा मानती हूँ.. तो मज़ाक मत करना, मैं हैंडल नहीं कर पाऊँगी, सम्बन्धों को लेकर तो बिलकुल नहीं.. जब शुरुआत से ही उसने अपनी कमज़ोरियाँ, अपनी स्थिति स्पष्ट कर रखी थी, फिर क्यों ज़रूरी था तुम्हारे लिए यह खेल... और पक्के खिलाड़ी हो तुम, तुम इस खेल को तब तक खेलते रहे जब तक वह उसे सच मान जीने न लगी.. पर खेल के भी तो कुछ तरीके होते होंगे न, लोग कहते हैं कि खेलने की स्पिरिट बहुत ईमानदार होती है, वह भी नहीं सीखा तुमने..
उसके फोन की घंटी अचानक से बजती है, और वह मैसेज बताता है कि उसे भेजने वाले ने उसके बारे में बहुत सी जानकारियाँ इकट्ठी की हुईं है। वह इग्नोर करती है, लड़की होने के अपने डर की वज़ह से। पर फोन के बजने का सिलसिला नहीं रुकता। एक दिन के मैसेज ने उसे थोड़ा डराया या कि अचम्भित किया क्योंकि उसमें उसकी 'जाति' की बात थी। वह 'जाति' जिसे लेकर कभी तो उसे गुमान हुआ करता था, पर धीरे धीरे वह अपनी पहचान को इन जातिगत परिवेश से बाहर बनाने की कोशिश कर रही थी। तभी पहली बार जवाब दिया था उसने, क्योंकि उसके लिए यह पहली दफे था, जब कोई उससे उसकी जाति जान कर बात कर रहा हो.. और फिर सीधे शादी का प्रस्ताव...अमूमन वह लड़कों को लेकर बहुत पॉज़िटिव नहीं रहती, जीवन के अनुभव ही कुछ ऐसे रहे.. पर इस बार ये बात उसकी सोच की सीमाओं से परे थी कि कोई उसकी जाति, उसकी पहचान ढूँढ़कर उसे तकलीफ देने उसकी ज़िन्दगी में आएगा.. उसने यकीन किया तुमपर तुम्हारी हर बात पर, और तुम खेलते रहे उसके यकीन के साथ लगातार.. तुम्हें कभी नहीं लगा कि इस खेल से जो टूटेगा उसकी भरपायी कभी नहीं हो सकेगी.. तुमने बताया कि तुम प्यार में धोखा खा चुके हो, किसी ने अपने जीवन की बेहतरी की संभावनाओं को देखते हुए तुम्हारा दिल तोड़ा है, वह तुम्हारे चोट खाए मन की पीड़ा महसूस कर सोचती रही कि क्यों कोई किसी का दिल तोड़ता है? कोई जानबूझकर किसी की आँखों में कैसे आँसू दे सकता है, पर तुमने उन्हीं आँखों को आँसू दिया, जिसने तुम्हारी चोट (?) को समझा, उन आँखों में जिनमें तुम्हीं ने उम्मीदें दी थीं, पर वे उम्मीदें तुम्हारे लिए तो खालिस ज़रिया थीं न, इसे समझ नहीं सकी वो बेवकूफ लड़की.. शब्दों का बेहद गलत इस्तेमाल करते हो तुम, शब्द ज़रिया है न तुम्हारे लिए, किसी में अहसास जगाने का... तुम्हें याद है, तुमने उससे पूछा था कि तुम छोड़ कर तो नहीं चली जाओगी और उसका जवाब था कि मेरे लिए भावनाएँ बहुत ज़रूरी हैं और मैं अपने संबंध में सबसे पहले और सबसे ज़्यादा वही चाहती हूँ। उसकी भावुकता आज उसकी कमज़ोरी बन चुकी है। हालाँकि मैंने उसे कई दफे समझाया था, अपनी भावनाओं को संभाल के रखो, यह दुनिया बहुत क्रूर है, वह तुम्हारी निर्दोष भावनाएँ डिज़र्व नहीं करती, बेहद चालाकी से तुम्हारी भवानओं को अपने खेल का साधन बना लेगी यह दुनिया और वह उसी मुस्कान के साथ कहती कि अरे, संभाल के रखने से तो जो है, वह भी खो जाएगी न.. भरोसा नहीं करेंगे तो जिएँगे कैसे, अविश्वास के साथ जीना बहुत मुश्किल होता है दी, और भावनाओं के बिना जीवन जीवन कहाँ रहेगा... पर, पता है अब वह भी इस बात को मान चुकी है तुम्हारी बदौलत.. एक खूबसूरत दुनिया का ख्वाब देखने वाली उन आँखों में अब जो बचा है वह है, अविश्वास वह भी भयानकता की हद तक। तुम्हें बहुत शुक्रिया उसकी मजबूती को उसकी कमज़ोरी बना डालने के लिए.. तुम्हारी जाने कितनी ही बातें उसें यों याद है मानो उसने याद किया हो उन्हें, पर व्यक्ति का इंवॉल्वमेंट जितना गहरा और सच्चा होता है, बातों को बिसराना उतना ही मुश्किल.. while trusting me is your decision and proving u rite is mine, तुम्हारे ही शब्द थे न... शब्द जिन्हें उसने सच माना पर जो तुम्हारे लिए महज़ कोरे शब्द थे किसी भी तरह की भावना से दूर... आप जैसे लोगों के रहते उसकी आँखों के ख्वाब को तो टूटना ही था....!!
शुक्रिया उसके भरोसे को भय में तब्दील करने के लिए.. तुम्हारी उपलब्धियों में एक उपलब्धि यह भी...। बधाई स्वीकार करो..!!


Hai Swati... This is me Harshita... I am hoping you remember me... I have talk to you something really important.. please reply
जवाब देंहटाएंHey hii Harshita!! How are you!! Sorry I have not seen your message! That's why replying late
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