मंटो को जानिए और पहचानिए अपने भीतर की मंटोइयत को..
अगर आप मेरे अफसानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो इसका मतलब है कि यह ज़माना ही ना-काबिले बर्दाश्त है...
एक ना-काबिले बर्दाश्त समय के सच को रेशा रेशा उघाड़ने वाले कलाकार की ज़िंदगी के कुछ पहलुओं को उकेरती है, नंदिता की फिल्म –मंटो
सुबह से मंटों को उनके लिखे के ज़रिए दुबारा से समझने जानने की कोशिश कर रही हूँ, कल सुबह सुबह मंटो देख भी आई.. पूरा सिनेमा हॉल खाली था, कुल पांच लोग थे.. निराशा हुई यकीनन, दबंग, हैप्पी न्यू इयर और इन जैसी भतेरी फिल्मों के लिए तालियाँ बजाने वाले दर्शक मंटो देखने क्यों नहीं आते हैं... क्या हमें अपने दर्शकीय बोध को बेहतर करने की ज़रुरत नहीं है..
शुरू से ही बायोग्राफीज़, डायरियां पढ़ने का शौक रखने वाली मैं नंदिता दास की इस फिल्म’ मंटो’ को देखने का इंतज़ार कर रही थी, और इसके ट्रेलर मेरे उस इंतज़ार को एक उतावली बेचैनी में तब्दील कर रहे थे...
एक बदनाम लेखक के नाम से मशहूर मंटो को जितना पढ़ा, वह अपने लेखन में बेबाक ही नज़र आए.. और उस बेबाकी को हासिल करना कतई आसान नहीं.. मुक्तिबोध की अँधेरे में कविता को पढ़ते, पढ़ाते हुए जिस स्प्लिट पर्सनालिटी की बात होती रही, उस तरह की स्प्लिट पर्सनालिटीज़ से भरा हुआ है यह समय.. एक डर जो हमें रोकता है, सुविधापरस्ती की एक चाह जो हमें कायर बनाती है... ऐसे समय में हम सभी को अपने भीतर थोड़ी सी मंटोइयत को ज़िंदा करने की ज़रूरत तो है ही..
एक अलग ही सौन्दर्यबोध को मानने वाला यह समय जो किताबों से काफी दूर है, मंटो को नहीं पहचानता.. अपनी आज की दुनिया जिनसे मेरा रोज़ राबता होता है, उन्हें बार बार इस फिल्म को देखने की बात करना क्या महज़ इस फिल्म को प्रमोट करना था या मंटो की दुनिया में उन्हें शामिल करना था.. मेरा मकसद शायद उन्हें मंटो की दुनिया में शामिल भर करना था क्योंकि जब हम एक बार मंटो की दुनिया में शामिल होते हैं तो अपने भीतर की बहुत सारी बंद खिड़कियों को भी खोलते हैं...
इंसानी पहचान को सबसे ऊपर रखने वाले कलाकार को सिर्फ इसलिए अपनी ज़मीन अपना वतन छोड़ना पड़ा, क्योंकि कुछ सियासतदानों ने मज़हब के नाम पर एक ज़मीन के दो टुकड़े कर देने का फैसला सुना दिया, कल बात-बात में अंग्रेजी की मुखालफत करते करते एक युवा सज्जन गुलामी से विकास के जुड़े होने की बात करते रहे और मैं हतप्रभ यही सोचती रही कि हमारे लिए विकास के मायने क्या हैं...
एक इंसान की ज़िंदगी के कई सारे पहलू होते हैं और उन्हें कुछ घंटों की फिल्म में समेटना संभव भी नहीं होता दो घंटे की फिल्म में एक कलाकार की जिंदगानी को दर्शाना और ऐसी उम्मीद करना बहुत सही नहीं है ... जैसा कि नंदिता ने अपने लगभग हर इंटरव्यू में कहा भी है कि उनकी कोशिश थी उस मंटोइयत को बचाना, जो मंटो की पहचान है, जो हमंमे आपमे सबमे होती है, पर हम उसे दबा देते हैं... और वैसे भी यह फिल्म बायोपिक नहीं है.. एक संवेदनशील कलाकार की ज़िंदगी के कुछ पन्नों को उनकी लिखी कुछेक कहानियों के ज़रिए दर्शाने की एक कोशिश है और यह कोशिश अपने आप में बेहतरीन है..
फिल्म शुरू होती है एक कहानी से जिसमे एक छोटी सी बच्ची के माँ बाप उसे पैसों के लिए बेचते हैं, पर वह लड़की खुद को नहीं बेचती उस बच्ची की जिंदादिली को कैमरे के ज़रिए बखूबी पेश किया गया है फिल्म में, यह कहानी वह दरवाज़ा है जिसके जरिए फिल्म मंटो के जीवन में प्रवेश करती है...
आज़ादी के जश्न पर जब वह सफिया को उठाता है और कहता है कि यह खुशी वह साथ मनाना चाहता है और उससे भी प्यारा दृश्य जब वह अपने होने वाले बच्चे से बात करता है तुम एक आज़ाद देश में पैदा होगे, इस और ऐसे कुछ और दृश्य मंटो के निजी पक्ष को बेहद प्यार से उभारते हैं
बंबई को बेपनाह चाहने वाला कलाकार जब बंबई छोड़ने को मजबूर होता है उससे पहले का दृश्य और अपने दोस्त श्याम के साथ वाला मंटो का वह संवाद याद कीजिए..
मंटो - वो हड्डियाँ कहाँ जलाई या दफनाई जाएँगी,जिन पर से मजहब का गोष्ट चीलें नोच-नोच कर खा…
श्याम - भगवन के लिए अपनी ये डायलॉगबजी बंद करो. वो लोग तुम्हारी किसी कहानी के किरदार नहीं हैं.वो मेरे अपने लोग हैं.जीते-जागते असली लोग.
मंटो - पर या तो सब की ज़िन्दगी है श्याम या फिर किसी की भी नहीं.
श्याम - ये सब तुम्हारे लिए कहना-लिखना आसन है.
श्याम - साले मुसलमानों की टोल है…
मंटो - मैं भी तो मुसलमान हूँ श्याम. अगर यहाँ फसाद हो जाये तो मुमकिन है तुम मुझे ही मार डालो.
श्याम - हाँ,मुमकिन है मैं तुम्हें भी मार डालूँगा.
मंटो पाकिस्तान जाने की तयारी करने लगते हैं.श्याम उन्हें रोकते हैं और कहते हैं कि वैसे भी तुम कौन से बड़े मुसलमान हो?
मंटो जवाब देते हैं...इतना तो हूँ कि मारा जा सकू.
सांप्रदायिकता, धर्मान्धता की यह आग आज भी झुलसा रही है... आज भी तो हिन्दू मुस्लिम मारे गए की बात अलग अलग होती है... इन्सानों के मरने की बात, इन्सानियत के मरने की बात किसे परेशान करती है यहां.. अभिव्यक्ति की आज़ादी, सिस्टम से लड़ते एक ईमानदार व्यक्ति की हताशा को देखते हुए हुए हमें अपने समाज की तहों तक में फ़ैली जमी विकृति की बू आती... और 1940 के दशक का यह किरदार कितना अपना लगने लगता है...
ईमानदारी वैसे भी किसी समय ख़ास के लिए प्रासंगिक नहीं होती, वह हमेशा के लिए नई, ज़रूरी होती है, यह फिल्म वही नयापन लिए हुए है और उतनी ही ज़रूरी है
इंडिया टी हाउस का अचानक से पाक टी हाउस बन जाना, लाहौर में गांधी की हत्या की खबर का आना ये सभी छोटे छोटे दृश्य बड़े प्रभाव लिए हुए हैं..
प्रगतिशीलता के गुटों में शामिल होना प्रगतिशील होने की शर्त नहीं, मंटो इसका सबूत हैं... तरक्कीपसंद मंटो को भारत और पाकिस्तान दोनों देशों की हकीकत चुभती है तोड़ती है.. बंबई के क़र्ज़ से कभी बाहर नहीं आना चाहने वाला लेखक उसे कभी भूल नहीं पाता, उन चिट्ठियों को खोल नहीं पाता, पर सहेज़ता रहता है...
बेशक मंटो फिल्म का शीर्षक है, पर मंटो की यह कहानी सफिया , इशमत, श्याम, अशोक, जैसे अन्य अनेकों किरदारों के बिना पूरी नहीं होती, वे हर किरदार मुकम्मल हैं उनकी हर कहानियों की तरह जिनपर अलग से फ़िल्में बनाई जा सकती हैं, अलग समीक्षाएं की जा सकती है...
अभिनय के लिहाज़ से भी यही कहा जा सकता है कि नवाज़ ने तो मंटो को जिया ही है पर सफिया बनी रसिका दुग्गल, श्याम बने ताहिर भसीन, इस्मत बनी राजश्री देशपाण्डेय, समेत अलग अलग कहानियों के किरदार को ज़िंदा करने वाले, उन कहानियों का हिस्सा बनने वाले रणवीर शौरी, दिव्या दत्ता, परेश रावल, गुरदास मान, तिलोत्तमा शोम, नीरज कबीर... समेत सभी ने अपने किरदार को बखूबी जिया है.. (हो सकता है कुछ नाम छूट गए हों.. माफी के साथ)
नंदिता दास और पूरी टीम इस फिल्म के लिए बधाई की पात्र है..
यह फिल्म जिस समय की बात करती है अपने सेट्स, अपनी सिनेमैटोग्राफी, वेशभूषा सभी के ज़रिए उसे ज़िंदा करती है... कॉफ़ी हाउस डिस्कशंस, इस्मत, श्याम से दोस्ती की दुनिया में ले जाती है, जहां कोई बेवज़ह का शोर नहीं बस सच के साथ खड़े होने की जिद है और यह फिल्म जो बात करती है वह बात उस समय की होने के बावजूद आज के लिए भी है-
तुम हरगिज़ तय नहीं कर सकते कि इसे पढ़ लिख कर लोग कैसा महसूस करेंगे... यह सामाजिक भावना के आहत होने का हवाला देने वालों को मंटो का जवाब है...
एक बनावटी सुन्दरता की चाह सच को ढकने पर जोर देती है... झूठे विकास को दिखाने के लिए समाज में फ़ैली नग्नता को, बीमारियों को कहीं और शिफ्ट कर दिए जाने के सत्ता संस्थानों के प्रयासों को सच बोलने वाले सच दिखाने वाले लोग फहहाश भी लग सकते हैं पर मंटो सच को सन्दर्भों में पढ़े जाने की बात करते हैं जब वे यह कहते हैं कि
सच तो हरगिज़ नहीं बोलना चाहिए वे सफे फाड़ देने चाहिए जो हमें पसंद न हो, वे आईने तोड़ देने चाहिए जो हमें हमारी बदसूरती से रूबरू कराते हों..
ऐसा कहते हुए भी वे सच के साथ खड़े होने की अपनी जिद को ही दुहराते हैं...
फिल्म का आख़िरी दृश्य कितना मार्मिक बन पड़ा है जहां मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों को मज़हबों के नाम पर उन्हें भारत पाकिस्तान में शिफ्ट किया जा रहा है..
देख आइए यह फिल्म क्योंकि जब आप सिनेमा घर से निकलेंगे तब आप मंटो के साथ होंगे अपने भीतर थोड़ी सी मंटोइयत लिए ...
#मंटो



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