खंडित स्मृतियों का कोलाज : मैंने मांडू नहीं देखा




 कल रात 'मैंने मांडू नहीं देखा' ख़त्म की...
बीते दिनों प्रभा खेतान फाउंडेशन के एक कार्यक्रम में जब शायदा मैम ने अपने बगल में बैठी एक स्त्री से मिलवाया कि इनसे मिलो ये पारुल हैं इन्डियन एक्सप्रेस में काम करती हैं और कि ये स्वदेश दीपक की बेटी हैं, मैं बहुत प्लीजेंटली सरप्राइज़ हुई. मेरे दिमाग में अचानक अपने जेएनयू के दिनों में देखे नाटक कोर्टमार्शल के दृश्य घूम उठे, जिसे तैयार किया था, अस्मिता के अरविंद गौड़ ने... मुझे अच्छी तरह याद है कि नाटक देखने के बाद मैंने टेक्स्ट पढ़ा था.. फिर नाटक पर चर्चा और नाटककार पर भी.. यह जानती थी कि स्वदेश दीपक कहां है किसी को नहीं पता पर उन सात सालों की भयानक यातना को कहाँ जानती थी... मैं शायद इस बाबत पूछना चाहती थी, पर अच्छा हुआ कि नहीं पूछा.. कुछ यातनाएं कभी पीछा नहीं छोड़तीं..
उस कार्यक्रम के अगले दिन मैंने खूब जानकारी इकट्ठा करनी चाही. सुकांत दीपक के ‘पापा एल्सवेयर’ से लिए गए उद्धरण जो कि ऑनलाइन मौजूद है, को पढ़ा. (अभी वह किताब पढी जानी है) और मंगा लिया 'मैंने मांडू नहीं देखा', मांडू को बिलकुल नहीं जानती थी और इस किताब के नाम को लेकर साहित्य से दूर रहने वाले लोग हंस रहे थे और मैं लड़ रही थी उनसे. हालांकि इस किताब को पढ़ते हुए बहुत सारी लड़ाई चलती रही... इस किताब को पढ़ते हुए ही मांडू को जाना और इस तरह कई पन्ने एक साथ खुले इस किताब के ज़रिए  मुझे साहित्य में आत्मकथात्मक लेखन पसंद है, मैं उनसे खुद को जोड़ती सीखती चलती हूँ पर मैंने मांडू को नहीं देखा में यातना है, भयानक यातना.. इसे पढ़ते हुए स्वदेश दीपक की सफरिंग या उनकी पत्नी गीता की सफरिंग कुछ हद तक हमारे भीतर भी उतर आती है.. इसे पढ़ते हुए हमें किसी मायाविनी का जादू नहीं बांधता बल्कि यह किताब अपने दर्द से बांधती है... एक लगातार लिखने वाला व्यक्ति किस कदर डर से भर जाता है, अपनी भाषा तक भूल जाता है...
A fractured prose for fractured autobiography इस किताब के लिए यह विशेषण बिलकुल सही है पर खंडित स्मृतियों से भरी यह किताब पूरी संवेदनाओं से भरी हुई है. इस किताब की भयावह जर्नी में सबसे उदास कविता का जन्म हुआ, वसंथा या कि अपूर्वा- शायद दोनों
शासक वर्ग और पुलिस के पास अत्याचार के अनोखे तरीके हैं. मरने से पहले उनको पागल बना दिया, जैसे वसंथा के पिता को बना दिया गया और जैसा वसंथा के साथ दुहराया जाना है क्योंकि जिन लड़कियों का नाम वसंथा होता है, वह स्वाभाविक मौत कभी  नहीं मरती..  
जो ठिगने हैं उन्हें कद्दावर कैसे मानूं. उस भाषा के साहित्य का दुर्भाग्य तय है, जहां आलोचक महान हो, कवि नहीं, हिन्दी के महान कवियों को कुछ नहीं लेना देना लहू में लथपथ लोगों की उम्मीदों से. एक प्रकृति की ओट में खडा शिखंडी दूसरी दूर तुमसे रहकर अखंड सुहागिनी का असंभव  दंभ भरती. लेखकों के महान होने का निर्णय भविष्य करता है इन दोनों कवियों का भविष्य बहुत छोटा है.
मैंने मांडू नहीं देखा किताब सिर्फ इस एक वाक्य के ज़रिए लेखक की जीवन में आई यातनाओं की बात नहीं करती. इसके साथ साथ साहित्य व कला की बड़ी भूमिकाओं पर बात करती है तभी तो स्वदेश कवि श्रीकांत वर्मा को इंदिरा गांधी का चंदबरदाई कह पाते हैं और यह भी कि नसीरुद्दीन शाह अपने आप को नाटक के पात्र से बड़ा समझने लगा है
Bipolar disorder patients live between two extremes
और यह किताब इस डिसऑर्डर से गुज़र रहे लोगों की भावनाओं को समझने के लिए एक ज़रूरी दस्तावेज़ की तरह है.
I am having a strong death wish I am no more capable of living in this world of hostile circumstances. I followed an inaccurate map and I lost. This feeling of inadequacy gives birth to impotent fear that robs my courage and cripples my reasoning
मुक्ति शब्द का अर्थ मृत्यु कैसे हो गया? दुःख की नदी से जब बाहर आएं तो अर्जित किए अनुभव ही मुक्ति  है.... संजोकर रखिए पीले क्षण को, जीवनानुभाव बनेंगे...
शायद स्वदेश ने डॉक्टर श्रीकांत की बात को समझा, की कोशिश पीले क्षणों को संजोने की .. यह श्रीकांत शरतचंद्र का श्रीकांत है हमारे वाले ठिगने कवि नेता नहीं
पर हमेशा एक डर कि
"जो बोलता हूँ , जो बताता हूँ उस पर सुनने वालो का विशवास नहीं होता, काफ्का पर भी लोग विश्वास नहीं करते थे. मैं काफ्का की कहानी मेटामोर्फोसिस का नायक हूँ जो कॉकरोच में बदलना शुरू हो चुका था."
यह लाइन पढ़ती हूँ और टैगोर थिएटर में देखा यह नाटक फिर से चलने लगता है, इस बार स्वदेश दीपक की शक्ल भी दीखती है.  
कुछ रहस्य न बांटे जा सकते हैं न बताए, वे बस आपको मथते रहते हैं, तोड़ते रहते हैं, वे हर रात सपनों में आते हैं और आपको उबरने नहीं देते पर कुछ प्राप्त करने की इच्छा लगातार जिलाए रखती है, क्या वाकई.. क्या इसी वज़ह से सात साल की भयानक यंत्रणा, जीवन समाप्त करने के तीन प्रयास सफल नहीं हुए. या अपने मित्र विकास की बात में कुछ मतलब समझ आया था कि मरना लगभग असंभव है, क्यों न हम जीने की कोशिश करें..
जब दुःख के दिन बरसों में तब्दील हो जाएं तो क्या क्या मर जाता है है, मेरे वाले रोग में शुभकामनाएँ और आशीर्वाद मर जाते हैं इस रोग को इस देश में सामाजिक स्वीकृति नहीं मिली..  जब स्वदेश यह लिखते हैं तो सोचती हूँ कि आज भी कहाँ मिली है इस रोग को सामाजिक स्वीकृति.  
और जब शुभकामनाएँ मरने लगती हैं तो वाकई समझ नहीं आता टुमौरो का अर्थ:
"मुझे टुमोरो का अर्थ समझ नहीं आ रहा था क्या अगला दिन, टुमौरो का वस्तार होना शुरू हो गया. महीनों में फिर बरसों में अंदर बैठे डर ने हाथ पकड़ बताया शायद तुम्हारा टुमौरो बहुत लंबा है किसी कवि की लाइन याद आई. टुमौरो, एंड टुमौरो, एंड टुमौरो.."
कायर पिता संतान को अच्छे नहीं लगते.. सुकांत ने स्कूल- दोस्तों से छिपाना शुरू कर दिया. तुम उसके फादर नहीं रिलेटिव हो. इस सामाजिक दंड से तंग आकर बेटी शहर छोड़ दिल्ली चली गई/ मै आतंकित रहने लगा कि गीता भी न छोड़ जाए इन दिनों मेरी कल्पनाएँ डरावनी हो गई है. पानी भरी बाल्टी से डूब जाने की दहशत होगी. नहाना बंद कर दिया.
इस किताब से गुज़रना बहुत सारे अंधेरी तकलीफों से गुज़रना है... रात को सोये सोये जैसे 'मैंने मांडू नहीं देखा' की आवाज़ आकर डरा जाती है तो कभी थक गई गीता की आवाज़ सुनाई पड़ती है कि 'यू मस्ट डाई. माई दीपक, मस्ट डाई. आई विल चेंज माई प्रेयर्स टू गॉड.'
सात साल एक गहरी खाई में रहने के बाद भाषा का इस्तेमाल भूल जाने के बावजूद स्वदेश अँधेरे से अँधेरे की भाषा में बतियाते रहे. एक लगातार अशांत रह रही आत्मा विचित्र भाषाएँ सीख लेती है और इसके शब्द नहीं होते किसी भी शब्दकोष में.. पर यह किताब एक बहुत बड़ा कोष है सिर्फ तकलीफों का नहीं, जीवनानुभवों का... यह किताब अवसाद और शून्य की तनातनी में अवसाद को चुनते हुए (Between grief and nothing I will take grief) उस अवसाद और अँधेरे के बरक्श उससे बाहर आ उसकी कहानी कह सकने के साहस का भी दस्तावेज़ है ...

टिप्पणियाँ

  1. बहुत बढ़िया..पढ़ना चाहूँगी। दरअसल आपके लेख ने पढ़ने को मजबूर कर दिया है कहाँ से प्राप्त कर सकती हूँ 'मैंने मांडू नहीं देखा'?

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    1. किताब अमेजन पर उपलब्ध है। ज़रूर पढ़ो...

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  2. बहुत सुंदर लिखा है,,,,अभी ही किताब पढ़ी ,इसलिए जल्दी ही उसके बारे पढ़ना अलग ही कर यात्रा पर ले जा रहा है।

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