आज इतनी ज़रूरी बात इतनी स्पष्टता के साथ प्योली ने कही जिसे हम सोशल कंडीशनिंग से हासिल अपने डर की वजह से हमेशा इग्नोर कर देते हैं। जहां शरीर की दीखने वाली बीमारियों तक को अनदेखा करना सीख जाते हैं हम वहां मन के स्वास्थ्य पर बात करना कहां आसान हो पाता है।
पागल कहलाने का डर सबसे ज़्यादा होता है...

बड़ी हिम्मत से कहने पर जब दिमाग का फितूर है सुनते हैं तो बड़ी मुश्किल से जुटाई गई वह थोड़ी सी हिम्मत भी उड़ जाती है और मन थोड़ा और गहरे अंधेरे में पहुंच जाता है। हम बिजली के बहुत सारे स्विच ऑन कर देते हैं। भागने की एक कोशिश यह भी होती है हालांकि हम इसे खुद को संभालने की कोशिश की तौर पर देखते हैं उस वक़्त...!!
एकदम शांत से समय में आप अजीब से सवालों में खुद को बुरी तरह उलझा पाते हैं और उस उलझन से उस वक़्त निकल न पाने की छटपटाहट आपके भीतर बौखलाहट भर देती है।
आपको कुछ लोग ऐसे भी मिलेंगे जो आपकी इस बेचैनी को आपकी भावुकता कह अनजाने में ही आपको थोड़ा और डरा देंगे।

मुझे खुद कई कई बार लगा है कि मैं अपनी एंजाइटी, अपने डर को हैंडल नहीं कर पा रही हूं और मुझे सहायता लेनी चाहिए पर शायद कंडीशनिंग से जनित डर की ही वजह से नहीं गई कि क्या मैं वहां भी खुद को पूरा कह पाऊंगी...

पर जानती हूं बहुत ज़रूरी है कहना, ज़रूरी है पागल कहलाने के किसी भी डर से बाहर निकल अपनी दिक्कत कहना, ज़रूरी है खुद को प्यार करना...
आप भी कहिए, बातें करिए, खुद को शेयर कीजिए, दोस्तों से बातें कीजिए उनका हालचाल लीजिए, खुद को प्यार कीजिए, मैं भी सीख रही हूं...

शुक्रिया प्योली  इतने ज़रूरी पोस्ट में मुझे टैग करने के लिए। और आपने बिल्कुल सही लिखा, यह पितृसत्ता स्त्रियों को खुद से और एक दूसरे से प्यार करने से रोकती है। ऐसे में खुद को और दूसरों को प्यार करना और जताना वाकई क्रांतिकारी कदम है...

खूब खूब सारा प्यार आपको और सबको ❤️


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