वो क्या है कि जिसकी तलाश है...


मैं भाग जाना चाहती हूं।
कहां
कहां भाग जाना चाहती हो?
पता नहीं
पर यह पता है कि मैं भाग जाना चाहती हूं
पर क्यों?

रोशनी के नाम पर जो भी दिखता है यहां वह चुभता है मुझे बेतरह। मुझे यकीन नहीं होता इस रोशनी पर तनिक भी। यह रोशनी सिर्फ एक परत है, जो मेरे भीतर एक अजीब सी अकुलाहट पैदा करती है...

फिर क्या ढूंढ़ती रहती हो हर वक़्त...

एक अदद सच्ची जगह ढूंढ़ती हूं, भरोसे का वह कोना ढूंढ़ती हूं जहां डर न हो... खोजती हूं वह दिन, ढूंढ़ती हूं वह ठीया जहां मिलावट न हो मुस्कानों में किसी के...

इस रोशनी की तलाश तो मुझे कतई नहीं थी...यहां सबने कितनी सारी चमकती परतें ओढ़ रखीं है और मेरा दम घुटा जाता है यहां...

सो, मैं भाग जाना चाहती हूं एक ऐसी जगह, जहां मैं खुल कर सांस ले सकूं...!!

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