ताकि तेरा भी इक आसमां हो और मेरा भी इक आसमां हो...
जो समय हमारे आसपास है, वह नफ़रतों का समय है। मैं जानती हूँ कि मेरा यह कहना बहुतों को रास नहीं आएगा बहुत सारे सवाल भी आएंगे। पर इस समय में मैंने जाने कितनी ही बार सोचा कि इतनी नफरत कहाँ से आ गई हमारे बीच। क्या इस नफरत का किसी तरह के श्रेष्ठता बोध, जो कि किसी विशिष्ट जाति, धर्म, लिंग के प्रति होती है, से कोई संबंध है? माफ कीजिएगा पर मुझे हरबार इसका जवाब ‘हाँ’ में मिला। इसके साथ ही, मुझे इन सवालों को हल करने का एकमात्र तरीका मुहब्बत व बराबरी में मिला और इस मुहब्बत व बराबरी के लिए हमें मजबूत होना होगा, बहुत मजबूत।
बहरहाल इस मुश्किल समय में एक फिल्म आती है 'थप्पड़'। और इस फिल्म को मैं अकेले या सिर्फ महिला मित्रों के साथ नहीं देखना चाहती थी और यह मेरा पूरी तरह एक कॉन्शस डिसिजन था। मैं जानती हूँ कि दबंग जैसी फिल्में देखने वाले लोगों को यह फिल्म पसंद नहीं आएगी। वैसे भी 'थप्पड़ से डर नहीं लगता' से 'एक थप्पड़... पर नहीं मार सकता' के बीच हमारे सिनेमा में बहुत सुंदर बदलाव आए हैं। स्त्री के ओब्जेक्टीफिकेशन से भरे हमारे सिनेमा ने अमृता,मीनल अरोड़ा, मालती, रानी जैसे बहुतेरे सुंदर और सशक्त किरदार दिए हैं।
मुझे पूरा यकीन है कि इस फिल्म को अतिरंजना (एक्जैजरेशन) बताएँगे तो कुछ इसे घर फोड़ने को उकसाने वाला सिनेमा बताएँगे। पर बक़ौल अमृता जिसे जोड़ना पड़े, यकीनन वह टूटा हुआ है, और उसे जबरन जोड़ने की कोशिश में हम और तल्ख होते जाते जाते हैं प्यार से और ज्यादा महरूम होते जाते हैं।
इस फिल्म में इतने सारे लेयर्स हैं न जिसे समझे जाने की ज़रूरत है। सिनेमा देखते हुए आवाज़ आई कि एक छोटी सी बात को कितना खीच रही है अमृता। और मैं सोचती रही हर वह घटना जब माएँ अपनी बेटियों को घर बचाने की सीख देती रहीं और इस तरह घर बचाने की सारी ज़िम्मेदारी एक औरत पर डाल दी जाती रही। आज भी खाना बनाना सीखना एक औरत के लिए गाड़ी चलाना सीखने से ज़्यादा ज़रूरी है। गाड़ी चलाने की बात पर मुझे खुद के साथ हुई एक घटना याद आ गई जब मुझे एक एजेंसी वाले ने कहा था कि लड़कियों के लिए तो औटोमेटिक गाडियाँ ठीक होती हैं। ऐसा स्टेटमेंट देने वाले लोगों की मानसिकता जेंडर बायस्ड नहीं है? जाने कितने ही लोगों ने अब तक कहा हो तुम तो नौकरी न भी करो तो क्या होगा या कि तुम्हारे पैसे कहाँ खर्च हो जाते हैं? मैं हमेशा सोचती रही सोच मे इतनी गैर बराबरी पर उन्हे क्यों नहीं टोका गया और फिर पाती हूँ कि हमारा समाज भयानक गैर बराबरी पर टिका समाज है और इतना ही नहीं उसे ग्लोरीफ़ाई कर सेलिब्रेट करने वाला समाज है।
एक स्त्री बड़ी गाड़ी खरीदती है तो पितृसत्ता मे गहरे धंसे समाज की भौंहे चौकन्ना हो जाती है, एक स्त्री नौकरी करने की इच्छा रखती है या कि करने का निर्णय लेती है तो ज़रूर उसे कुछ गलत करना है और यह गलत और यह नैतिक आचरण की सारी किताब बस स्त्रियों को घोंट कर पी जानी है तभी एक पिता की उम्र का व्यक्ति अपनी बेटी की उम्र की उपलब्धियों पर 'मटरगश्ती नहीं करती तो पहले हो जाता' जैसा आशीर्वाद देता है या कि शहर की हवा लग जाने का हवाला देता है और अब सोचती हूँ तो पाती हूँ उन पुरुषों को बेइंतहा डरा हुआ कि शहर आ गई, बाहर निकाल गई तो उस नकली सच को समझ सकेगी जिसे पुरुषों ने खुद के स्वामित्व को बनाए रखने के लिए क्रीएट किया है।
इस फिल्म पर बात करते हुए यों तो अमृता के ज़रिए बातें की जाएंगी पर मैं चाहूंगी कि हर किरदार को सिर्फ देखा न जाए, पढ़ा जाए, सीखा जाए... आखिरी दृश्य के पहले सुनीता की उन्मुक्तता से लबरेज खुशी देखिए, नेत्रा का अपनी कमजोरी और डर पर जीतना देखिए, सुलक्षणा का उस कंडीशनिंग को समझते हुए अपनी बहू को गले लगाना देखिए और संध्या जी का पति सचिन द्वारा लाए गए हारमोनियम को प्यार से छूना देखिए, आप खुद के भीतर प्यार और हिम्मत पाएंगे।
ऐसा नहीं है कि जो जख्म हमें नहीं दीखते वे होते नहीं हैं। वे इसलिए नहीं दीखते क्योंकि हम देखना नहीं चाहते तभी हम प्राउडली, नैचुरली अमानवीय और हिंसक बातें कहते और प्रैक्टिस करते हैं।
मैं अपने सभी मित्रों से गुजारिश करती हूँ कि अपने आस पास की महिलाओं से बात करें आप पाएंगे कि कितने सपने दफन पड़े हैं उनके भीतर और जिसकी किरचन आज भी उनके जेहन को छीलती है और शायद उन सपनों के कत्ल में कहीं आपका हाथ न हो। ताकि उस एक मूमेंट से आप ऐसे किसी गुनाह में शामिल न हों।
आइए न अमृता के भाई की तरह रीबूट करते हैं अपने आप को ताकि हम एक बराबरी का सुंदर समाज बना सकें जहां मुहब्बत और सम्मान सबका हक़ हो...!! बस यही तो ख़्वाहिश थी अमृता की, और यही ख़्वाहिश हम सबकी है और यह ख़्वाहिश कतई नहीं टूटनी चाहिए।
और हाँ एक और बात, एक खूबसूरत बात, खूबसूरत रिश्ते की बात कहना रह गया, अमृता और पिता का रिश्ता और मुझे लगा कि ऐसे रिश्ते ज़िंदगी को खूबसूरत बनाने की उम्मीद हैं, सुंदर रोशनी है और क्या ही संयोग है कि यह पिता कवि हृदय है जिसका ख्वाब है कि कोई रिश्ता किसी के आसमां को न लीले :
मगर मेरे आसमां को
तहा कर मुझे सौंप देना
ताकि तेरा भी इक आसमां हो
और मेरा भी इक आसमां हो
यहाँ मैं एक और बात बताना चाहती हूँ कि कोई एक फिल्म, कोई एक कलाकृति पूरी दुनिया नहीं बदल सकती, यह कोई टैबलेट या कि इंजेक्शन तो है नहीं कि एक साथ सब पर असर कर दे। पर इस फिल्म को देखने से पहले इसके एक इंटरव्यू को देखने पर एक मित्र का देर रात फोन आता है और उसकी आवाज़ में एक दर्द, तकलीफ सुनाई देती है, मैं वजह नहीं समझ पाती, आवाज़ आती है, आई एम सॉरी, और फिर यह भी कि मैं अपनी ममा को हग करना चाहता हूँ। मैं जानती हूं और मुझे पूरा यकीन है कि इस तरह का असर बहुत लोगों पर हुआ होगा और होगा और यह है एक बेहतर, मुहब्बत और बराबरी वाले एक बेहतर समाज के निर्माण में एक फिल्म या एक आर्टवर्क का कॉन्ट्रीब्यूशन।
बहरहाल इस मुश्किल समय में एक फिल्म आती है 'थप्पड़'। और इस फिल्म को मैं अकेले या सिर्फ महिला मित्रों के साथ नहीं देखना चाहती थी और यह मेरा पूरी तरह एक कॉन्शस डिसिजन था। मैं जानती हूँ कि दबंग जैसी फिल्में देखने वाले लोगों को यह फिल्म पसंद नहीं आएगी। वैसे भी 'थप्पड़ से डर नहीं लगता' से 'एक थप्पड़... पर नहीं मार सकता' के बीच हमारे सिनेमा में बहुत सुंदर बदलाव आए हैं। स्त्री के ओब्जेक्टीफिकेशन से भरे हमारे सिनेमा ने अमृता,मीनल अरोड़ा, मालती, रानी जैसे बहुतेरे सुंदर और सशक्त किरदार दिए हैं।
मुझे पूरा यकीन है कि इस फिल्म को अतिरंजना (एक्जैजरेशन) बताएँगे तो कुछ इसे घर फोड़ने को उकसाने वाला सिनेमा बताएँगे। पर बक़ौल अमृता जिसे जोड़ना पड़े, यकीनन वह टूटा हुआ है, और उसे जबरन जोड़ने की कोशिश में हम और तल्ख होते जाते जाते हैं प्यार से और ज्यादा महरूम होते जाते हैं।
इस फिल्म में इतने सारे लेयर्स हैं न जिसे समझे जाने की ज़रूरत है। सिनेमा देखते हुए आवाज़ आई कि एक छोटी सी बात को कितना खीच रही है अमृता। और मैं सोचती रही हर वह घटना जब माएँ अपनी बेटियों को घर बचाने की सीख देती रहीं और इस तरह घर बचाने की सारी ज़िम्मेदारी एक औरत पर डाल दी जाती रही। आज भी खाना बनाना सीखना एक औरत के लिए गाड़ी चलाना सीखने से ज़्यादा ज़रूरी है। गाड़ी चलाने की बात पर मुझे खुद के साथ हुई एक घटना याद आ गई जब मुझे एक एजेंसी वाले ने कहा था कि लड़कियों के लिए तो औटोमेटिक गाडियाँ ठीक होती हैं। ऐसा स्टेटमेंट देने वाले लोगों की मानसिकता जेंडर बायस्ड नहीं है? जाने कितने ही लोगों ने अब तक कहा हो तुम तो नौकरी न भी करो तो क्या होगा या कि तुम्हारे पैसे कहाँ खर्च हो जाते हैं? मैं हमेशा सोचती रही सोच मे इतनी गैर बराबरी पर उन्हे क्यों नहीं टोका गया और फिर पाती हूँ कि हमारा समाज भयानक गैर बराबरी पर टिका समाज है और इतना ही नहीं उसे ग्लोरीफ़ाई कर सेलिब्रेट करने वाला समाज है।
एक स्त्री बड़ी गाड़ी खरीदती है तो पितृसत्ता मे गहरे धंसे समाज की भौंहे चौकन्ना हो जाती है, एक स्त्री नौकरी करने की इच्छा रखती है या कि करने का निर्णय लेती है तो ज़रूर उसे कुछ गलत करना है और यह गलत और यह नैतिक आचरण की सारी किताब बस स्त्रियों को घोंट कर पी जानी है तभी एक पिता की उम्र का व्यक्ति अपनी बेटी की उम्र की उपलब्धियों पर 'मटरगश्ती नहीं करती तो पहले हो जाता' जैसा आशीर्वाद देता है या कि शहर की हवा लग जाने का हवाला देता है और अब सोचती हूँ तो पाती हूँ उन पुरुषों को बेइंतहा डरा हुआ कि शहर आ गई, बाहर निकाल गई तो उस नकली सच को समझ सकेगी जिसे पुरुषों ने खुद के स्वामित्व को बनाए रखने के लिए क्रीएट किया है।
इस फिल्म पर बात करते हुए यों तो अमृता के ज़रिए बातें की जाएंगी पर मैं चाहूंगी कि हर किरदार को सिर्फ देखा न जाए, पढ़ा जाए, सीखा जाए... आखिरी दृश्य के पहले सुनीता की उन्मुक्तता से लबरेज खुशी देखिए, नेत्रा का अपनी कमजोरी और डर पर जीतना देखिए, सुलक्षणा का उस कंडीशनिंग को समझते हुए अपनी बहू को गले लगाना देखिए और संध्या जी का पति सचिन द्वारा लाए गए हारमोनियम को प्यार से छूना देखिए, आप खुद के भीतर प्यार और हिम्मत पाएंगे।
ऐसा नहीं है कि जो जख्म हमें नहीं दीखते वे होते नहीं हैं। वे इसलिए नहीं दीखते क्योंकि हम देखना नहीं चाहते तभी हम प्राउडली, नैचुरली अमानवीय और हिंसक बातें कहते और प्रैक्टिस करते हैं।
मैं अपने सभी मित्रों से गुजारिश करती हूँ कि अपने आस पास की महिलाओं से बात करें आप पाएंगे कि कितने सपने दफन पड़े हैं उनके भीतर और जिसकी किरचन आज भी उनके जेहन को छीलती है और शायद उन सपनों के कत्ल में कहीं आपका हाथ न हो। ताकि उस एक मूमेंट से आप ऐसे किसी गुनाह में शामिल न हों।
आइए न अमृता के भाई की तरह रीबूट करते हैं अपने आप को ताकि हम एक बराबरी का सुंदर समाज बना सकें जहां मुहब्बत और सम्मान सबका हक़ हो...!! बस यही तो ख़्वाहिश थी अमृता की, और यही ख़्वाहिश हम सबकी है और यह ख़्वाहिश कतई नहीं टूटनी चाहिए।
और हाँ एक और बात, एक खूबसूरत बात, खूबसूरत रिश्ते की बात कहना रह गया, अमृता और पिता का रिश्ता और मुझे लगा कि ऐसे रिश्ते ज़िंदगी को खूबसूरत बनाने की उम्मीद हैं, सुंदर रोशनी है और क्या ही संयोग है कि यह पिता कवि हृदय है जिसका ख्वाब है कि कोई रिश्ता किसी के आसमां को न लीले :
मगर मेरे आसमां को
तहा कर मुझे सौंप देना
ताकि तेरा भी इक आसमां हो
और मेरा भी इक आसमां हो
यहाँ मैं एक और बात बताना चाहती हूँ कि कोई एक फिल्म, कोई एक कलाकृति पूरी दुनिया नहीं बदल सकती, यह कोई टैबलेट या कि इंजेक्शन तो है नहीं कि एक साथ सब पर असर कर दे। पर इस फिल्म को देखने से पहले इसके एक इंटरव्यू को देखने पर एक मित्र का देर रात फोन आता है और उसकी आवाज़ में एक दर्द, तकलीफ सुनाई देती है, मैं वजह नहीं समझ पाती, आवाज़ आती है, आई एम सॉरी, और फिर यह भी कि मैं अपनी ममा को हग करना चाहता हूँ। मैं जानती हूं और मुझे पूरा यकीन है कि इस तरह का असर बहुत लोगों पर हुआ होगा और होगा और यह है एक बेहतर, मुहब्बत और बराबरी वाले एक बेहतर समाज के निर्माण में एक फिल्म या एक आर्टवर्क का कॉन्ट्रीब्यूशन।


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