शायद कोई संभावना बची हो अब भी उम्मीदों को ज़िंदा बनाए रखने की...
पिछले कुछ दिनों से तबीयत थोड़ी ठीक नहीं अमृतसर किताब जिसे अभी तक पढ़ लेना था, वह भी कुछ पन्नों से अधूरी रह गई है। ऐसे ही बेचैन, थके दिनों में एक रात जब न आंखों में नींद थी, न कुछ कर सकने की शक्ति थी शरीर में. उस दिन मनोज वाजपेई का जन्मदिन था और लोग उनकी या उनके साथ की तस्वीरें लगा रहे थे। M K Pandey सर के स्टेटस में ऐसी ही एक तस्वीर देख फोन में ही 1971 फिल्म खोल ली। सोचा था कि देखते देखते सो जाऊंगी । पर फिल्म ऐसी न थी जो सोने देती। शायद उस रात से अब तक अच्छी नींद नहीं आ पाई। फिल्म खत्म हो जाने के भी काफी देर तक आपको छोड़ती नहीं। यह कहना शायद ज़्यादा सच होगा कि अब तक फिल्म मेरे साथ ही है।
मैं काफी समय से, इन दिनों कुछ ज्यादा ही खुद को सवालों से भरी मनःस्थिति में पाती हूं। देशों द्वारा जिस सेना का ग्लोरिफिकेशन किया जाता है, उसके पीछे की मनःस्थिति समझना चाहती हूं। लड़ाई की जरूरत समझना चाहती हूं। प्रेम को समझना चाहती हूं। उस प्रेम के प्रतिफल को सोचना चाहती हूं। चाहती हूं सोचना कि प्रेम का प्रतिफल कुछ तो मिलना ही चाहिए।
मुझे हर सत्तानवीशों पर शक होने लगा है। संदेह होता है उनकी कार्रवाइयों पर। यह संयोग ही है कि इन्हीं दिनों ‘अमृतसर’ किताब पढ़ रही हूं जिसमें हिंसा से लथपथ पंजाब है। उस हिंसा की ज़िम्मेदारी कौन लेगा। कितनों को अपनी पहचान छुपानी पड़ी। वो दर्द आज भी चुभता होगा यकीनन उन लोगों को। एक बार एक बहुत बुजुर्ग और प्रतिष्ठित पंजाबी लेखक ने कहा भी था कि पंजाब ने बहुत सहा है।
लड़ाइयां खत्म हो जाती हैं। पन्नों में कैद हो जाते हैं उन लड़ाइयों के किस्से जिनमें लिखने वालों का नजरिया ज़रूर शामिल होता है।
1971 एक लड़ाई का किस्सा है, उसी देश से जिसके नाम का इस्तेमाल बहुत आसानी से लिया जाता है, गाली की तरह। उसी फिल्म में शुरुआत और आखिर का एक कॉमन संवाद याद आता है। फिल्म के दो महत्वपूर्ण किरदार (मेरे अज़ीज़ अदाकार) बात करते हैं:
एक बात बताओ पाकिस्तान में क्या पंजाबी रहते हैं?- हाँ रहते हैं
अच्छा ये बताओ पाकिस्तान में क्या सिंधी रहते हैं:? हाँ रहते हैं
मुसलमान भाई लोग तो रहते ही होंगे? हाँ क्यों दिमाग खा रहा है
फिर दो देश क्यों बना दिए..
कितने प्यार से दूसरा किरदार कहता है कि भाई गलती हो गई दुबारा नहीं करेंगे। क्या एक नागरिक की तरह देश के सत्तानवीश भी सोचते होंगे कभी??
दोनों देश अपनी अपनी जगह इन लड़ाइयों को जस्टिफाई कर सकते हैं, उन्हें लड़ने वाले जवान अपने भीतर देश को बसाए लड़ते रहते हैं पर देश भूल भी तो सकता है न जवानों को! फिर, फिर क्या हो! देश की विस्मृति का दंश एक नागरिक झेलता है। फिल्म में ऐसा ही दंश झेलते दीपक डोबरियाल को आखिरी दृश्य में देख मुझे न जाने क्यों टोबा टेक सिंह और मंटो याद आते हैं।
सैनिक या नागरिक जब अपने देश पहुंचने को आतुर हो और उन्हें कोई पहचाने ही न! दूसरे देश की जादती पर मैं नहीं बात कर रही तो शायद मेरी बात किसी को एकतरफा भी लगे। पर अपना वतन! उस दूसरे देश में भी यकीन शब्द को ज़िंदा रखने वाले कुछेक लोग ज़रूर होंगे। पर मैं सिर्फ अपने वतन की बात करूंगी।
कितने सैनिक मिसिंग हैं, सैनिकों को लेकर सरकार द्वारा की जाने वाली ग्लोरीफिकेशनंस का वे सैनिक क्या करें।
हो सकता है मैं अव्यावहारिक और कम्युनिस्ट ठहरा दी जाऊं। इस शब्द को भी गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है इन दिनों। पर सोचने और सवाल पूछने के अपने नागरिक अधिकार को मैं नहीं छोड़ सकती।
युद्ध में झोंक देने वाली सरकारें चाहती क्या है? क्या युद्ध वाक़ाई समाधान देता है?
फिल्म शुरू होने के कुछ देर बाद ही केंद्रीय किरदार मेजर सूरज जिसे मनोज वाजपेयी ने निभाया है अपनी डायरी मे लिखता है:
हिन्दुस्तान ने हमें क्यों भुला दिया हमें मालूम नहीं। पाकिस्तान हमें क्यों भुला देना चाहता है हमें पता नहीं।
बहरहाल, उम्मीद के अलावा ज़िंदा रहने का और कोई सहारा नहीं होता। हम भी इसी उम्मीद के सहारे ज़िंदा हैं कि हम अपने अपनों से कभी मिल पाएंगे। लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि यह उम्मीद हाथ पर हाथ धरे बैठने से नहीं पूरी होती। मैं एक बार फिर आने वाले कल का इंतजार करूंगा।
यह किरदार उस उम्मीद में अपने वतन पहुँचने की कोशिशें शुरू करता है। इन कोशिशों में कितने साथी शहीद हुए और क्या ही संयोग कि पहला शहीद की पहचान मुसलमान कौम से थी जिसे बड़ी आसानी से वतनपरस्त कह दिया जाता है। अपने वतन पहुंचने की साथी सैनिकों की कोशिशों पर पानी न फिरे, इसलिए वह अपने गाँव, अपने परिवार, अपनी बीवी जो प्रेग्नेंट थी, की तस्वीरें याद कर खुद को कुर्बान कर देता है।
इन कोशिशों में आगे चलकर और साथी छूटते जाते हैं और टूट चले फ्लाइट लेफ्टिनेंट गुर्टू (दीपक डोबरियाल) को याद दिलाते हैं उनकी शहादत का। अपने वतन की ज़मीन को छोने की उम्मीद के बहुत पास पहुँचकर दुश्मन सेना द्वारा भगोड़ा उपाधि प्राप्त कर अपनी आखिरी सांस लेते हैं मेजर सूरज और हम दर्शकों की उम्मीद आंसुओं से सान जाती है।
और फिर आखिरी दृश्य में हम देखते हैं लड़खड़ाते कदमों के साथ गुर्टू को, और डायरी के सूख चले पन्ने की फरफराहट के साथ यही आवाज़
दोनों मुल्कों की सरकारें जानती थी कि सैनिक पकड़े गए। रेडक्रॉस जानती थी। फिर उन गुज़रे हुए सालों का ज़िम्मेदार कौन और उन न आने वाले नामालूम कितने सालों का ज़िम्मेदार कौन।
बहरहाल, उम्मीद के अलावा ज़िंदा रहने का और कोई सहारा नहीं होता। हम भी इसी उम्मीद के सहारे ज़िंदा हैं कि हम अपने अपनों से कभी मिल पाएंगे। लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि यह उम्मीद हाथ पर हाथ धरे बैठने से नहीं पूरी होती। मैं एक बार फिर आने वाले कल का इंतजार करूंगा।
फिल्म खत्म हो जाती है इंतज़ार और उम्मीद के साथ। दोनों शब्द संभावनाओं से भरे शब्द हैं। शायद कोई संभावना बची हो अब भी उम्मीदों को ज़िंदा बनाए रखने की। मैं यह शब्द लिख रही हूँ और आँखें बह रही हैं। मैं और कुछ नहीं कहना चाहती...


टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें