हम सबको बुधिया को जानना चाहिए...!!



मैं निराश हूँ। बेतहाशा निराश हूँ, अपने आस पास से, अपनी व्यवस्था से। मुझे नहीं पता लोग यह समझते क्यों नहीं कि जब हम सवाल करते हैं तो इसका मतलब सिर्फ यह है कि हम एक ऐसा देश बनाना चाहते हैं जो किसी के सपनों को न लील ले। आप नहीं देखना चाहते तो मत देखिए पर कभी गर कोशिश करेंगे तो पाएंगे कितनी किरचने हैं टूटे हुए सपनों की हमारे आसपास। ज़्यादतियों से भरे समाज में जीते हैं हम और शायद उन ज्यादितियों में हिस्सेदार भी होते हैं। ज्यादितियों को न देखना और फिर भी उसे खारिज कर देना हमारी हिस्सेदारी ही बयां करती हैं। हमने इन ज्यादितियों को नौर्मलाइज कर दिया है वैसे ही जैसे गैरबराबरियों को कर दिया है। यह भी तो सच है कि हम गैरबराबरियों को एक्सेप्ट ही नहीं सेलिब्रेट भी करते हैं। कोई कहता है कि पढ़ कर दिमाग खराब हो गया है कोई कहता है पढ़ो पर कम्युनिस्ट मत हो जाना। मैं हैरान हो जाती हूँ, कभी कभी हिम्मत हारने लगती हूँ कि क्यों हमने देखना बंद कर दिया है। देखिए न, मैं इधर उधर की बात करने लगी जबकि बात करनी थी एक फिल्म की। फिल्म को आज भी बहुत सारे लोग वैसे ही देखते हैं जैसे लिटरेचर को। इसलिए सवाल उठाने वाली फिल्म, सवाल उठाने वाली किताब को आप चुप करा देना चाहते है। अपने अतार्किक शोर को इतना तेज़ कर देते हैं और सच है कि बड़ी संख्या उस शोर के साथ हो जाती है। दुखद है...!! आप नहीं समझ पाते कि आप रेग्रेसिव फिल्में देखते हैं दीवाने होकर,उन्हे प्रमोट करते हैं, रेग्रेसिव राइटिंग्स पढ़ते हैं पर खुद को रेग्रेसिव मानना स्वीकार नहीं करते। प्रोग्रेसिव शब्द सुंदर है न, आकर्षित करता है। हम सब उसका लेबल तो चाहते हैं पर कोशिश नहीं करते। देखिए न, फिर भटक गई।
तो बात करनी थी उस फिल्म की जो कुछ समय पहले देखी गई थी। इस उदास समय में जब बहुत सारी उदास खबरों, हालांकि उन खबरों के लिए 'उदास' विशेषण बहुत सटीक नहीं है या कहूँ कि 'नाकाफी' है, ने लगातार कुछ करने न दिया। यह फिल्म भी उस उदासी और गुस्से को तेज़ करती है। फिल्म, जिसका शोर नहीं हुआ जबकि होना यह चाहिए था कि खूब बात होती इस फिल्म की, इस किस्से की। और लोग सोचते, सवाल करते। मैंने फिल्म देखी और अपने समाज को भी देखा इसके ज़रिए। ऑनलाइन उपलब्ध साधनों से और जानकारी जुटाने को मन बेचैन हो उठा। जो जानकारियाँ मिलीं उसने फिल्म की तरह बेचैन किया। फिल्म थी, बुधिया सिंह- बोर्न टू रन।
फिल्म को एक बच्चे की कहानी कह देना पता नहीं सही होगा या नहीं। बुधिया सिंह नाम का बच्चा जिसे न अपनी काबिलियत का पता न सपने का। ज़िंदगी की बेसिक ज़रूरतें जहां पूरी नहीं होतीं वहाँ कोई क्या ही सपने देखे। माँ बच्चे को कुछ पैसों के लिए बेच देती है। एक माँ को अपने बच्चे को क्यों बेचना पड़ता है क्या यह सवाल नहीं होना चाहिए। एक ज़िंदा समाज क्या करता है? ज़रूरी सवाल उठाता है न... पर हम खामोश रहते हैं!! अपने अपने दराज़ों में बंद।  
एक और व्यक्ति है बिरंची दास। जो गरीब बच्चों को कौशल व शिक्षा देने का प्रयास कर रहा है। वह सामान्य व्यक्ति नहीं है, उसे सत्ता का समर्थन प्राप्त है पर राजनीति में शामिल होना उसकी महत्वाकांक्षाओं में शामिल नहीं है। उसका अपने इलाके में अच्छा खासा प्रभाव है। वह जब बुधिया को उसके खरीदे गए मालिक के यहाँ से भागता हुआ चोटिल पाता है तो न सिर्फ उसे एक बेहतर स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराता है बल्कि उसे अपने ट्रेनिंग स्कूल पर ले आता है, उसकी माँ की सहमति से। यहाँ तक बुधिया को लेकर उसकी कोई महत्वाकांक्षा रही होगी, ऐसा लगता नहीं क्योंकि बुधिया के किसी हुनर से वह अनजान ही है। बिरंची की बीवी नाराज़ होती है क्योंकि बच्चे वैसे ही बहुत हैं और संसाधनों का अभाव भी है। अब तक बुधिया एक बेहद सामान्य बालक है जिसे बिस्तर गीला करने की आदत है, साथी बच्चे मज़ाक बनाते हैं और बुधिया उन्हें गाली देता है। बुधिया आपको किसी भी गाँव का एक बेहद सामान्य बच्चा लगेगा। बच्चे को गाली की सजा मिलती है,और वह सज़ा है- मना किए जाने तक भागते रहने की। बिरंची उसे सज़ा देकर भूल जाता है और वापिस होने पर भी बुधिया को भागता पाता है। उसे घबड़ाहट होती हैबुधिया को डॉक्टर को दिखाया जाता है, सबकुछ सामान्य। वह पहली घटना थी जब बिरंची की मुलाक़ात बुधिया के हुनर से होती है। बुधिया अब तक अनजान ही है।

अब शुरू होती है बुधिया की ट्रेनिंग, उसे जूते, ज़रूरत के मुताबिक डाइट दिए जाते हैं। उसे भागना अच्छा लगता है, वह खुश है, नए जूते पाकरन नई साइकिल पाकर। उसका दाखिला अच्छे  स्कूल में कराया जाता है। इसके पहले बिरंची द्वारा बुधिया को लीगली एडोप्ट भी कर लिया जाता है। स्कूल में  पहले दिन 'क्या किया'पूछे जाने पर वह कहता है: "हगा और भगा" उसका यह जवाब बाल मन की ईमानदारी ही तो है जिसकी सच्चाई अभी गुमी नहीं है।
वह भागता हैखूब भागता है और उसका हर कदम जैसे बिरंची की जीत है। पर उसका भागना, उसका जीतना बहुतों को चुभता रहा। राजनीति मेरी समझ से बाहर होती जा रही है। कितनी प्रतिभाएँ होंगी हमारे आस पास जिनका गला घोंट दिया गया होगा, चाइल्ड राइट्स, वुमेन राइट्स के नाम पर बनाई गई समितियां भी मुझे समझ नहीं आतीं। यदि वाकई ये सारी व्यवस्थाएँ अपना काम कर रही होतीं तो क्या हमारा समाज एक बेहतर समाज नहीं होता। बीते दिन 'पान सिंह तोमर' देखी थी। एक व्यक्ति जो देश के लिए मेडल लाता है, उसे देश कितना याद रखता है और उसके बागी बनने में क्या देश की व्यवस्था जिम्मेदार नहीं है?
हम अपने अपने घरों में बैठ जब यह कहते हैं कि सबकुछ बहुत सुंदर है तो क्या हमारी जीभ नहीं लड़खड़ाती ? मुझे अश्लील लगती है वह हंसी जो झूठ को सच साबित करती है, क्रूर और हिंसक लगती है मुझे वह शांति जो वास्तविकताओं से आँखें फेर लेती है।

बुधिया एक चार साल का बच्चा था, मुझे नहीं लगा कि उसने खुद कोई सपना देखा था पर वह खुश था भागकर, वह एंजॉय कर रहा था उस पूरे प्रोसेस को! यह सिर्फ फिल्म नहीं, बुधिया सिंह पर बनी डॉक्यूमेंट्री और बहुत सारे सोर्सेज़ बताते हैं। यह सच है कि बिरंची बुधिया के ज़रिए एक सपने को जी रहा था, कम से कम फिल्म और इससे जुड़े रीसर्च को पढ़कर मुझे ऐसा ही लगा। महत्वाकांक्षाएँ कभी निष्ठुर भी हो जाती हैं, बहुत संभव है कि बुधिया के प्रति बिरंची के व्यवहार में भी कुछ निष्ठुरता आई हो पर चार साल के बच्चे के कदमों को रोक कर सिस्टम ने जो किया उसके पीछे वे उसके बचपन को बचाने की दलील दे सकते हैं। मैं इस दलील की सच्चाई नहीं जानती। सिस्टम की यह कार्रवाई मुझे बिरंची की महत्वाकांक्षा से कहीं ज़्यादा निष्ठुर लगी। और हाँमुझे भागते बुधिया की खुशी में सच्चाई दिखी, जिसे उससे छीन लिया गया।
और बुधिया में अपने सपने देखने वाले बिरंची को उसके ही घर मार दिया गया...
यदि सिस्टम वाकई बच्चों से उनका बचपन नहीं छीनना चाहता तो क्यों हमें बच्चे सड़कों पर मजदूरी करते दीख जाते हैं, क्यों हमें हर बच्चा स्कूल में नहीं दीखता? जिन गुब्बारों से बच्चों को खेलना चाहिए, उन गुब्बारों को बेचते हुए बच्चे क्यों दीखते हैं? और भी एक बात हम भलाई का जितना शोर मचाते हैं, क्या वाकई अपने इरादे और व्यवहार में उतने भले होते हैं हमहम सबको सोचना तो चाहिए ही इस बाबत...!!
सौमेन्द्र पाढीजिसने फिल्म बनाई थी वह तो जानता था कि बुधिया दौड़ने के लिए जन्मा था, तभी तो उसने नाम रखा-'बुधिया- बोर्न टू रन'। पर हमने रोक दिए उसके कदम। हम कितने भी नारे क्यों न लगा लें, हमारे समाज का सच बेइंतहा उदास करने वाला है और कभी कभी लगता है इसे हमने ऐसा बना दिया है। हम इसे सुंदर क्यों नहीं बने रहने देना चाहते।
मनोज वाजपेयी तो एक बेहतरीन अदाकार हैं ही पर बुधिया का किरदार निभाने वाले मयूर ने बुधिया को बहुत खूबसूरती से जिया है और यह बात बुधिया वाली डॉक्यूमेंट्री देखने के बाद भी कही जा सकती है।
मुझे नहीं पता आपमें से कितने बुधिया को जानते हैं पर हम सबको बुधिया को जानना चाहिए...!!

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