शबे फ़िराक़ की यारों कोई शहर भी है...
दिमाग में एक छवि घूम रही है, छवि एक पूरे इंसान की, जिसे इस अधूरे समाज ने नहीं स्वीकार किया और ऐसा करके उसने अपने अधूरेपन का ही परिचय दिया। यह समाज, जिसमें मैं भी शामिल हूं, आत्मस्वीकार से डरने वाला समाज है। यह भीरू समाज न खुद के सच को स्वीकार करता है और न ही मानता है अपने डर को बल्कि हर वक्त एक ऐसे गौरवबोध में रहता है जो उसी समाज के लिए घातक है...
एक डॉक्यूमेंटरी देख कर उठी हूँ। हालांकि इसका ज़िक्र सुने अब 1 साल से ज्यादा हो गया शायद उतना ही जितना समय हुआ Mx Dhananjay Chauhan से पहली मुलाक़ात का। मुझे वह पहली मुलाक़ात आज भी बेहद अच्छे से याद है, तारीख शायद 5 मई 2019 थी और जगह पंजाब विश्वविद्यालय। वही जगह जो धनंजय से और जिससे धनंजय काफी जुड़े हुए हैं।
युनिवर्सिटी में हुई मुलाक़ात ने मुझे उनके बारे में और भी जानने को मजबूर किया था, तभी पता चला कि धनंजय, जो पंजाब युनिवर्सिटी की पहली ट्रांस स्टूडेंट हैं, सक्षम ट्रस्ट की अध्यक्ष हैं, एलजीबीटी प्राइड की मुख्य आयोजक हैं, शास्त्रीय गायन और नृत्य में प्रशिक्षित हैं और अंतर्राष्ट्रीय समानता अधिकारी के तौर पर एक एक्टिविस्ट हैं। शायद उनकी उपलब्धियों में बहुत कुछ मुझसे छूट भी गया हो, उसके लिए माफी! प्रकृति द्वारा प्रदत्त अपनी पहचान की वजह से उन्हें जो प्रताड़ना झेलनी पड़ी, उन सबके बावजूद खुद को इंसान के रूप में स्वीकार करवाने की लड़ाई लड़ पाना, अपने होने के गौरव को डिगने न देना, बहुत ही मुश्किल है... हां यह करना किसी आम इंसान के वश की बात नहीं है, इसके लिए एक विलक्षणता चाहिए ही है...
धनंजय से उसके बाद भी कुछ मुलाक़ात और बातें हुई और हर दफ़े मैं उन्हें समझने की कोशिश करती रही और इस कोशिश में कुछ न कुछ सीखती रही।
मुझे पता है कि आप लोगों का संघर्ष बहुत लंबा है और मुश्किल भी... आपके संघर्षों को जीत में तब्दील होना ही है, इस समाज के ज़िंदा होने का यह भी एक सबूत होगा। शायद मैंने अपनी ज़िन्दगी में आपकी मुश्किलों को कम करने में कोई भूमिका नहीं निभाई है, पर अभी आपको सलाम करने का दिल कर रहा है...
यह बात मैंने धनंजय से पहली मुलाक़ात के बाद उन्हें कही थी और आज यह फिल्म देखने के बाद फिर से कहूँगी, कि मुझे गर्व है आप पर धनंजय! आपको खूब सलाम!
फिल्म में धनंजय अपनी बात पूरी स्पष्टता और दृढ़ता से बताते चलते हैं। एक अदद इंसान के रूप में स्वीकृति के लिए भी इस समाज में लड़ना पड़ता है। हर किसी की अपनी लड़ाइयाँ होती हैं पर धनंजय की लड़ाई सिर्फ धनंजय की लड़ाई नहीं है। जिस आत्मविश्वास और एम्पेथी के साथ वे अपनी बात रखती हैं वो हैरान करता है। हैरान शायद इसलिए कि जहां हम अपनी अंदरूनी लड़ाइयों से थक कर स्वीकृत मान्यताओं के आगे कई दफ़े सरेंडर कर देते हैं और अपने भीतर की मुलामियत खो देते हैं, वहाँ धनंजय लगातार लड़ रही हैं और इस मुश्किल लड़ाई ने भी उनके भीतर के प्यार को सूखने नहीं दिया है। उनके भीतर आपको नफरत नहीं दिखेगी।
वो समाज जो आपको हर कदम पर पीछे खींचने की कोशिश करता है वहाँ अपने होने की लड़ाई मुसकुराते हुए और पूरे जज़्बे के साथ लड़ना और लगातार संवाद की स्थिति बनाने की कोशिश करना आसान नहीं है। पर धनंजय यह मुश्किल काम करते रहे हैं बिना रुके, यही वजह है कि वे आज इस लड़ाई में इस मुकाम तक पहुँच पाए हैं। फीस माफ कराना, ट्रांस के लिए एक अलग वॉश रूम बनवाना, फॉर्म्स में थर्ड जेंडर का कॉलम एड कराना ये कुछ उपलब्धियां धनंजय की लड़ाई की हैं। वैसे तो ये बुनियादी चीज़ें है जिनके लिए किसी को लड़ने की ज़रूरत नहीं पड़नी चाहिए पर पाश कहते हैं न...
कि हम लड़ेंगे साथी
जब तक कि
लड़ने की ज़रूरत बाकी हो
इन सबके अलावा अपनी पहचान के साथ अपने को मुहब्बत करते हुए खड़े होना...!! यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। मैंने शुरू में कहा कि हम आत्मस्वीकार से डरने वाले लोग हैं और एक मुखौटा पहन जीने वाले लोग हैं जो इस बात को स्वीकार भी नहीं करना चाहते । इस लिहाज से यह समाज मुझे कई दफ़े झूठा समाज भी लगता है।
इस झूठे और भीरू समाज में पूरे साहस और अपने सच के साथ खड़ा होना हम सबको धनंजय से सीखना चाहिए।
आप सोचिए कि एक बच्चा, जो उसे दी गई पहचान के साथ सहज नहीं है, वह अपनी असहजता समझ पा रहा है पर उसके आसपास के लोग उसपर वही असहजता लाद देना चाहते हैं, धनंजय ने अपने जीवन में ओढ़ी हुई पहचान (जिंदगी) को चुनने से मना कर दिया। यह है उनकी उपलब्धि।
बेहतर जिंदगी के रास्ते में पढ़ने की ज़रूरत को धनंजय बखूबी समझते हैं, उन्हें जानने वाले उनके एकैडमिक एक्सिलेन्स को बखूबी जानते हैं। वे अपनी लड़ाई में सभी ट्रांस के लिए एजुकेशन सुनिश्चित करने की लड़ाई लड़ रहे हैं इसके अलावा इस समाज में जागरूकता की बेहद कमी है और इस दिशा में धनंजय बखूबी काम कर रहे हैं, स्कूल के बच्चों के साथ काम कर रहे हैं। फिल्म का वह दृश्य याद आ रहा है जिसमें एक बच्ची उनके कान में आई लव यू कहती है। यह प्यार हर किसी का हासिल होना चाहिए। इस फिल्म में धनंजय यह भी कहते हैं कि इन बच्चों और युवाओं को समझाने से भविष्य सुंदर हो सकता है और इसी उम्मीद में वे अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं।
अपने होने का उत्सव प्राइड के नाम से पिछले कई वर्षों से सेलिब्रेट कर रही है इनकी संस्था... हम सभी को अपने होने को स्वीकार करते हुए दूसरों के होने को भी स्वीकार करना है। वैसे भी किसी की पहचान को अननैचुरल कहने वाले हम कौन होते हैं। यह भी कि स्वीकार का यह भाव सिर्फ हमें नहीं बचाएगा, यह इस दुनिया में प्रेम बचाएगा और इसे थोड़ा सुंदर बनाएगा।
आप सब भी देखिए एडमिटेड और जानिए धनंजय के सफर को और उनके जज़्बे को... आप उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाएंगे...!
एक डॉक्यूमेंटरी देख कर उठी हूँ। हालांकि इसका ज़िक्र सुने अब 1 साल से ज्यादा हो गया शायद उतना ही जितना समय हुआ Mx Dhananjay Chauhan से पहली मुलाक़ात का। मुझे वह पहली मुलाक़ात आज भी बेहद अच्छे से याद है, तारीख शायद 5 मई 2019 थी और जगह पंजाब विश्वविद्यालय। वही जगह जो धनंजय से और जिससे धनंजय काफी जुड़े हुए हैं।
युनिवर्सिटी में हुई मुलाक़ात ने मुझे उनके बारे में और भी जानने को मजबूर किया था, तभी पता चला कि धनंजय, जो पंजाब युनिवर्सिटी की पहली ट्रांस स्टूडेंट हैं, सक्षम ट्रस्ट की अध्यक्ष हैं, एलजीबीटी प्राइड की मुख्य आयोजक हैं, शास्त्रीय गायन और नृत्य में प्रशिक्षित हैं और अंतर्राष्ट्रीय समानता अधिकारी के तौर पर एक एक्टिविस्ट हैं। शायद उनकी उपलब्धियों में बहुत कुछ मुझसे छूट भी गया हो, उसके लिए माफी! प्रकृति द्वारा प्रदत्त अपनी पहचान की वजह से उन्हें जो प्रताड़ना झेलनी पड़ी, उन सबके बावजूद खुद को इंसान के रूप में स्वीकार करवाने की लड़ाई लड़ पाना, अपने होने के गौरव को डिगने न देना, बहुत ही मुश्किल है... हां यह करना किसी आम इंसान के वश की बात नहीं है, इसके लिए एक विलक्षणता चाहिए ही है...
धनंजय से उसके बाद भी कुछ मुलाक़ात और बातें हुई और हर दफ़े मैं उन्हें समझने की कोशिश करती रही और इस कोशिश में कुछ न कुछ सीखती रही।
मुझे पता है कि आप लोगों का संघर्ष बहुत लंबा है और मुश्किल भी... आपके संघर्षों को जीत में तब्दील होना ही है, इस समाज के ज़िंदा होने का यह भी एक सबूत होगा। शायद मैंने अपनी ज़िन्दगी में आपकी मुश्किलों को कम करने में कोई भूमिका नहीं निभाई है, पर अभी आपको सलाम करने का दिल कर रहा है...
यह बात मैंने धनंजय से पहली मुलाक़ात के बाद उन्हें कही थी और आज यह फिल्म देखने के बाद फिर से कहूँगी, कि मुझे गर्व है आप पर धनंजय! आपको खूब सलाम!
फिल्म में धनंजय अपनी बात पूरी स्पष्टता और दृढ़ता से बताते चलते हैं। एक अदद इंसान के रूप में स्वीकृति के लिए भी इस समाज में लड़ना पड़ता है। हर किसी की अपनी लड़ाइयाँ होती हैं पर धनंजय की लड़ाई सिर्फ धनंजय की लड़ाई नहीं है। जिस आत्मविश्वास और एम्पेथी के साथ वे अपनी बात रखती हैं वो हैरान करता है। हैरान शायद इसलिए कि जहां हम अपनी अंदरूनी लड़ाइयों से थक कर स्वीकृत मान्यताओं के आगे कई दफ़े सरेंडर कर देते हैं और अपने भीतर की मुलामियत खो देते हैं, वहाँ धनंजय लगातार लड़ रही हैं और इस मुश्किल लड़ाई ने भी उनके भीतर के प्यार को सूखने नहीं दिया है। उनके भीतर आपको नफरत नहीं दिखेगी।
वो समाज जो आपको हर कदम पर पीछे खींचने की कोशिश करता है वहाँ अपने होने की लड़ाई मुसकुराते हुए और पूरे जज़्बे के साथ लड़ना और लगातार संवाद की स्थिति बनाने की कोशिश करना आसान नहीं है। पर धनंजय यह मुश्किल काम करते रहे हैं बिना रुके, यही वजह है कि वे आज इस लड़ाई में इस मुकाम तक पहुँच पाए हैं। फीस माफ कराना, ट्रांस के लिए एक अलग वॉश रूम बनवाना, फॉर्म्स में थर्ड जेंडर का कॉलम एड कराना ये कुछ उपलब्धियां धनंजय की लड़ाई की हैं। वैसे तो ये बुनियादी चीज़ें है जिनके लिए किसी को लड़ने की ज़रूरत नहीं पड़नी चाहिए पर पाश कहते हैं न...
कि हम लड़ेंगे साथी
जब तक कि
लड़ने की ज़रूरत बाकी हो
इन सबके अलावा अपनी पहचान के साथ अपने को मुहब्बत करते हुए खड़े होना...!! यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। मैंने शुरू में कहा कि हम आत्मस्वीकार से डरने वाले लोग हैं और एक मुखौटा पहन जीने वाले लोग हैं जो इस बात को स्वीकार भी नहीं करना चाहते । इस लिहाज से यह समाज मुझे कई दफ़े झूठा समाज भी लगता है।
इस झूठे और भीरू समाज में पूरे साहस और अपने सच के साथ खड़ा होना हम सबको धनंजय से सीखना चाहिए।
आप सोचिए कि एक बच्चा, जो उसे दी गई पहचान के साथ सहज नहीं है, वह अपनी असहजता समझ पा रहा है पर उसके आसपास के लोग उसपर वही असहजता लाद देना चाहते हैं, धनंजय ने अपने जीवन में ओढ़ी हुई पहचान (जिंदगी) को चुनने से मना कर दिया। यह है उनकी उपलब्धि।
बेहतर जिंदगी के रास्ते में पढ़ने की ज़रूरत को धनंजय बखूबी समझते हैं, उन्हें जानने वाले उनके एकैडमिक एक्सिलेन्स को बखूबी जानते हैं। वे अपनी लड़ाई में सभी ट्रांस के लिए एजुकेशन सुनिश्चित करने की लड़ाई लड़ रहे हैं इसके अलावा इस समाज में जागरूकता की बेहद कमी है और इस दिशा में धनंजय बखूबी काम कर रहे हैं, स्कूल के बच्चों के साथ काम कर रहे हैं। फिल्म का वह दृश्य याद आ रहा है जिसमें एक बच्ची उनके कान में आई लव यू कहती है। यह प्यार हर किसी का हासिल होना चाहिए। इस फिल्म में धनंजय यह भी कहते हैं कि इन बच्चों और युवाओं को समझाने से भविष्य सुंदर हो सकता है और इसी उम्मीद में वे अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं।
अपने होने का उत्सव प्राइड के नाम से पिछले कई वर्षों से सेलिब्रेट कर रही है इनकी संस्था... हम सभी को अपने होने को स्वीकार करते हुए दूसरों के होने को भी स्वीकार करना है। वैसे भी किसी की पहचान को अननैचुरल कहने वाले हम कौन होते हैं। यह भी कि स्वीकार का यह भाव सिर्फ हमें नहीं बचाएगा, यह इस दुनिया में प्रेम बचाएगा और इसे थोड़ा सुंदर बनाएगा।
आप सब भी देखिए एडमिटेड और जानिए धनंजय के सफर को और उनके जज़्बे को... आप उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाएंगे...!


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