मैं अब भी उम्मीद में ही जीना चाहती हूं।
बीते कुछ समय से अच्छा महसूस नहीं कर रही थी। दवाओं का असर ऐसा कि उनींदी सी ही रहती हर वक़्त । कहीं मन ठहरता ही नहीं था। जिधर भी जाती एक अजीब सी बेचैनी पाती। घूम फिर कर फेसबुक इंस्टा पर आती, पर राहत यहां भी नहीं मिलती।
समाचार चैनल तो शोर का कारखाना ही बन गए हैं। उस शोर को खरीदने वाले हम अपने मानसिक स्वास्थ्य का भी ख्याल नहीं कर रहे। चीखा चिल्ली, नफ़रत बस यही परोसा जा रहा है दिन रात। जब किसी से बात होती है और वो कहता/ कहती है कि न्यूज देख रहा / रही हूं तो डर जाती हूं मैं। पता नहीं मुझे कहना चाहिए या नहीं पर खबरों के नाम पर परोसे जा रहे, उन झूठों को, उन नफरतों को कंज्यूम करने वाले, एन्जॉय करने वाले हम कहीं अपने इंसान होने को तो नहीं खोते जा रहे।
कैरेक्टर एसैसिनेशन हो रहा है यहां न्यूज के नाम पर। अपनी बात को कहने का सलीका हम भी भूलते जा रहे हैं। हर कोई एक दूसरे के पैर खींच रहा है। कोई किसी को हाथ नहीं दे रहा संभलने को। यह सब एक वर्चस्ववादी नज़रिए का ही परिणाम है।
पता नहीं किसपर वर्चस्व स्थापित करना है। सिर्फ हम ही रहें तुम न रहो, ये कौन सी धारणा है भला। हम झूठ का कारोबार करते हैं, एक दूसरे को नीचा गिरा कर मज़ा लेते हैं, जीवन की सुंदर सुन्दर बातें हमने बस कार्यक्रमों में बोलने के लिए सेव कर ली हैं। जीने में उनका कोई उपयोग नहीं होता है और यही नॉर्मल है हमारे लिए । ऐसे में कोई इंसान गर बेचैन और परेशान हो जाए तो उसे एबनॉर्मल कह दिया जाएगा, एडजस्ट करने को कहा जाएगा उसी झूठ वाले नॉर्मल के साथ।
क्या सचमुच यही नॉर्मल है? इस normalcy में दम घुटता है। क्या सह-अस्तित्व (coexistence) वाकई संभव नहीं है? क्या जीवन को सही मायने में जीना वाकई संभव नहीं है? मैं अब भी उम्मीद में ही जीना चाहती हूं।


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