मुंबई डायरी


डायरी लिखने का शौक डायरी पढ़ने के बाद ही लगा था, हालाँक़ि वह शौक तो नहीं कहूँगी पर वह आदत अपने आलस्य में कब छूटी पता ही नहीं चला.. इस नए साल में पढ़ने की छूटी आदत को जब फिर से संवारना चाह रही हूँ तो यात्रा की एक बेहद खूबसूरत किताब सियाहत के बाद जो किताब उठाई वह एक नए दोस्त की नई आई किताब है जिसका शीर्षक है: ‘मुंबई डायरी’. और इसमें तनिक भी झूठ नहीं कि इसके डायरी नाम ने तो लुभाया ही..

बहरहाल, यह छोटी सी किताब जिसका नाम बेशक मुंबई डायरी है और लेखक ने भी इसे मुंबई में लिखी अपनी डायरी कहा है, पर यह न सिर्फ महज़ मुंबई है और न सिर्फ डायरी.. हाँ, यहाँ डायरी की आत्मीयता है और मुंबई का ज़िंदगी सा सतत प्रवाह... इन दोनों शब्दों को सीधे शब्दों में और अपनी समझ के हिसाब से मैं ऐसे ही देखती हूँ

बहरहाल यह किताब ज़िंदगी की डायरी हैं जिसमें शामिल हैं बहुत सारे किस्से.. कभी कभी यह किताब एक बड़ी यात्रा भी लगती है जिसमें शामिल हैं कई छोटी छोटी यात्राएँ. इन सबके अलावा स्मृतियाँ तो हैं ही बहुत सारी, शहर को लेकर, ज़िंदगी को लेकर, ज़ज़्बातों को लेकर, गुब्बारे बेचती लड़की, अपना आकाश बुनती लड़कियाँ, बहुविध स्मृतियां...

इस डायरी वाली किताब में प्रेम भी है, भाषा भी, राजनीति भी, सड़कें भी, आकाश का नीला रंग भी, बुद्ध का निर्वाण भी, प्रेम का अवसाद भी, गणतंत्र भी है, उस तंत्र की पहचान को बेचता गण भी...

एक बेहद छोटे आकार वाली यह किताब ज़िंदगी को लेकर बड़ी चिंताओं को समेटे हुए है... हमारे शब्द हमारी चिंताओं को दूर कर पाते हैं या नहीं, ये तो नहीं जानती, पर हमारे शब्द हमारे सोचने को तो नुमाया करते ही हैं...

विकास के बड़े शोर शराबे के बीच यह लेखक बार बार जीवन की चिंता करता है...

हम इस नकली ज़िंदगी के इतने आदी हो चुके हैं कि असली वाली को हम एक ऐसी कब्र में दफन कर देते हैं जहाँ रोशनी कभी पहुँच नहीं पाती

यह चिंता लेखक की संवेदनशीलता को तो उकेरता ही है, जिसे लेखक की प्रवाहमयी भाषा ने बेहद खूबसूरत लिबास पहनाया है ... लेखक जिस तरह से शहर के मार्फत जीवन को देखता है, या वहाँ के लोगों के बज़रिए शहर से बात करता है, दोनों ही खासे दिलचस्प हैं..

इस किताब से गुज़रने का सुख भी वैसा ही है जैसा किसी खूबसूरत यात्रा का हमराह होना...

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