सियाहत: यात्राएं ख़त्म नहीं होतीं



सियाहत किताब तो दोस्त की थी, जिसे बहुत पहले पढ़ लेना चाहिए था, पर नहीं पढ़ पायी..
दोस्त को शिकायत भी होगी ही, पर सिर्फ उस शिकायत को दूर भर करने के लिए इस किताब को नहीं पढ़ना था. बहुत पहले से ही यह तय था कि इस किताब को एक बिलकुल सामान्य पाठक की तरह पढ़ना है. बीते कुछ दिन से जब पैर में चोट की वज़ह से कहीं आने जाने की स्थिति में नहीं थी तो इस किताब ने बहुत साथ दिया और इस किताब से इस तरह एक अलग ही नाता बन गया है. यह नाता ख़ास इसलिए भी हो जाता है क्योंकि जाने कब से काइदे से मैंने कोई पूरी किताब नहीं पढी थी और इस किताब से वह अंतराल भी टूटा ही कल जब मैंने सुबह से शाम में इस किताब को ख़त्म किया.
इस तरह यह किताब 2019 में पढी गई मेरी पहली किताब बनी, जिसे पहले महीने की समाप्ति पर पढ़ा गया...
अब किताब की बात
मैंने अपनी ज़िन्दगी में बहुत सारी यात्राएं नहीं की हैं पर यात्राओं के महत्त्व को जानती रही हूँ हालांकि मेरी कल्पनाओं में यात्राओं ने मुझे बहुत रोमांचित किया है पर अलग अलग कारणों से यात्राओं की मेरी योजना स्थगित होती रही है... 'सियाहत' जिसके नाम का मतलब भी मुझे खुद लेखक से ही पता चला था, कल का मेरा पूरा दिन उसी की यात्रा में था.. कुछ भी कहने से पहले यह भी कहूंगी कि मैंने बहुत यात्रा वृत्तांत भी नहीं पढ़े पर इसे पढ़ते हुए या कहूं कि इस किताब की यात्रा करते हुए कहीं भी यह नहीं लगा कि हम महज़ कुछ अक्षरों व शब्दों से गुज़र रहें हैं. एक तो लेखक ने इसे इतनी खूबसूरती से संवाद शैली में लिखा है कि आप उन उन जगहों में साथ चलने लगते हैं. कई कई दफ़े इसे पढ़ते हुए हंसी आ रही थी, कहीं कहीं अजीब सी उदासी भी घेर ले रही थी.. बहुत स्पष्ट कहूं तो यह किताब सिर्फ किसी किसी भौगोलिक क्षेत्र की यात्रा नहीं कराती, यह बेहद खूबसूरती और उतनी ही संजीदगी से भारत जैसे विशाल देश की विविधता से हमारी पहचान कराती है, उन विविधताओं के बीच बसी साम्यताओं से हमारा परिचय कराती है और इससे भी अधिक उन स्थापित धारणाओं पर भी बहस करती है जो हम यदा कदा किसी भी परिवेश और उससे जुड़े लोगों के बारे में बना लेते हैं बिना उसके पीछे की वस्तुस्थिति का पता लगाए..
मेरे जैसा पाठक जिसने एक लम्बे अंतराल के बाद एक किताब उठाई हो और फिर उसे पूरी पढ़ के ही उठता है तो किताब के फ्लैप पर अजय तिवारी की जो बात है कि इसे पढ़ते हुए एक पल भी ऊब या निराशा नहीं होती पूरी तरह सच हो जाती है.
भोजन की पसंद नापसंद प्रेम में किए आपके फैसले की तरह हो सकती है पर इस किताब को पसंद करने के पीछे ऐसा कोई तर्क नहीं, बल्कि इस किताब की पठनीयता ही है. इस किताब से मेरा कनेक्शन इसलिए भी बनता है कि मैं भी उसी परिवेश से आती हूँ जहां किसी ख़ास समुदाय धर्म को लेकर कुछ ख़ास मान्यताएं हमारे कुछ भी सोचने समझने से पहले हमारे भीतर डाल दी जाती हैं और हम कोई सवाल भी नहीं करते
यह किताब एक साथ साहित्य, भाषा, समाजशास्त्र, इतिहास सबकी किताब बन जाती है. कोई एक किताब अपने भीतर भाषा, मिथक, इतिहास, समाजीकरण इतनी सारी चीज़ें समेट ले और वह भी इतनी खूबसूरती से, तो वह अपनी यात्रा में अपने पाठकों को शामिल कर ही लेगी.
बहुत सारे अलग अलग प्रसंग हैं, जो बहत छूते हैं मन को, मसलन एक मंदिर के बाहर एक मुसलमान का फूल बेचना.. यह किसी कहानी का रचा हुआ दृश्य नहीं है बल्कि हमारे ही देश का एक सच है. शुक्र है कि राजनीति वहां नहीं पहुँची और ऐसे ख़ूबसूरत दृश्य बचे हैं और ऐसे दृश्यों से साक्षात करना किसी भी नागरिक को बहुत हौसला देता है.
फिर वह दृश्य जहां लेखक किसी सहयात्री पर भरोसा कर अपनी किताब देता है अगले ही पृष्ठ पर एयरपोर्ट पर किसी युवक की मदद के बाद का संवाद -- मैं लोगों पर अविश्वास ही करता रहूँ तो किसी पर विश्वास कर ही नहीं पाऊंगा. मुझे यह दृश्य इसलिए तसल्ली दे गया क्योंकि अविश्वास करना बेहद आसान है पर अविश्वास के साथ जीना बेहद मुश्किल. तो बहुत ज़रूरी कि हम अपने निर्णयों में विश्वास को चुनें.
फिर उस मुस्लिम महिला का हिन्दुओं का गणपति ईद कहना पढने वाले के ज़ेहन में भी प्यार भर देता है.
पर उसी के ठीक ऊपर जो सच्चाई है, जो यकीनन हमारी व्यवस्था से जुड़ी है कितनी दुखद है. मानवीय श्रम कितना सस्ता है. न्यूनतम आय को लेकर कितनी बातें करती हैं हमारी सरकारें पर एक मनुष्य के श्रम का इतना भी मूल्य नहीं कि उसे जीवन जीने के लिए आवश्यक मूलभूत सुविधाएं मुहैया हो सकें.
अपनी यात्रा में यह किताब भाषा पर जगह के साथ पड़ते प्रभाव पर कितने अच्छे से बात करती है. एक बिहारी युवक एक लंबे समय तक जिस परिवेश में रहता है, उसके नोशंस उसकी भाषा में सहज ही शामिल होते चलते हैं.
एक ऐसे इलाके में जहां हम हर लिहाज़ से बाहरी हों, का इतना सत्कार और विदाई का वह दृश्य भारत की खूबसूरती को ही बयां करता है और हम पाठकों को भी भावुक कर जाता है.
हमारी शिक्षा व्यवस्था में साहित्य और समाज को जानने और समझने से ज़्यादा जोर ज़्यादा से ज़्यादा अंक ला प्रतियोगी परीक्षाओं को उत्तीर्ण करने पर रहा है. इस बिंदु को भी यह किताब छूती हुई चलती है.
चन्दन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग वाली बात ने तो मेरे खुद के भ्रम दूर किए क्योंकि इसे हमने भी ऐसे ही पढ़ा था कि चन्दन के पेड़ों पर सांप लिपटे ही रहते हैं.
ओ.ऐन.वी. के साहित्य को लेखक की सामाजिक स्वीकार्यता को जिस तरह से इस किताब के लेखक ने वहां के लोगों के ज़रिए जाना वह पूरी बातचीत किसी भी लेखक या लेखक बनाने की इच्छा रखने वाले के लिए एक पाठ की तरह है. यह सच है कि लेखक जब तक सेलिब्रिटी होना चाहेगा उसका अपने पाठकों से कनेक्शन नहीं बन सकता.
दक्षिण भारत में रहने के अपने छोटे से अनुभव की वज़ह से कई दृश्य तो बेहद अपने से लगे, चाहे वहां अपनी पसंद की मिठाई का न मिलना हो, या फिर वो हिन्दी इल्लै वाली बात. फिर बिहार व बिहारियों को लेकर एक ख़ास किस्म के राय से तो हर जगह राबता पड़ा है पर जीवन स्तर संबंधी बुराइयों की जड़ में गरीबी का होना और प्रशासन की इसमें भूमिका को लेकर ऐसे लोग बहस ही नहीं करना चाहते.
फूल और बच्चों वाला प्रसंग तो बेहद पोएटिक लगा. हालांकि कविताई से लबरेज़ और कई दृश्य किताब में मिलेंगे. भारत को लेकर भारत से बाहर के नागरिकों का पर्सपेक्टिव बहुत ईमानदार लगा.. सफाई को लेकर स्वच्छता अभियान के पाखण्ड से हम सभी वाकिफ हैं. हालांकि भक्त लोग इसे स्वीकार नहीं करेंगे वैसे ही जैसे गाय वाला मसला... आस्थाएं जो ख़ूबसूरत हो सकती हैं, उसे सत्ता वर्ग ने इतना सीमित और क्रूर बना दिया है जो भारत की छवि तक प्रभावित कर रहा पर कथित राष्ट्रवादियों को इससे कोइ फर्क नहीं पड़ता.
इतिहास को महसूस करते हुए उन जगहों को देखना वाक़ई ज़रूरी है, पर इस किताब के ज़रिए लेखक की उन यात्राओं से गुज़रते हुए इतिहास और समाज से गुज़रना और उन्हें जानना भी कम ख़ूबसूरत नहीं रहा...
मेरे लिए यह किताब दरअसल सामाजिक, भौगोलिक यात्राओं के समांतर भावनाओं की यात्रा भी रही...




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