काली औरत का ख़्वाब: इरशाद कामिल
अभी अभी ‘काली औरत का ख़्वाब’ किताब पढ़ के उठी हूँ, कल इस किताब के लेखक को बिलकुल सामने से सुनने का जो मौक़ा मिला था, उसका खुमार तो था ही, पर इस किताब का भी अपना ही खुमार था... आज इस किताब को पढ़ते वक़्त लूप में सोचा न था के गाने बज रहे थे मतलब कान और आँखें दोनों इरशाद के शब्दों का सफ़र कर रहे थे... इस किताब से गुज़रना इरशाद के गीतों के बनने के प्रोसेस से गुज़रना था.. रचना प्रक्रिया पर जब भी बात होती है हिन्दी में तो मुक्तिबोध की ‘रचना के तीन क्षण’ की बात ज़रूर होती है.. मुझे कल भी यही जानना था कि कविता और गीत दोनों ही पूरी तरह सृजनात्मक विधा रूप है, फिर उनकी रचना-प्रक्रिया में क्या समानता और क्या असमानताएं है ? चूंकि इरशाद हिन्दी साहित्य के विद्यार्थी रहे और अब साहित्य की दो महत्वपूर्ण विधाओं पर बाकमाल काम कर रहे हैं.. अपने इस किताब के साथ वे अपने गीतों के बनने की प्रक्रिया भर नहीं बताते, वे उस ख़्वाब की भी बात करते हैं जिसे पाने की जिद में उस तक पहुँचने की राहों की तलाश में मुंबई पहुँच गए थे, पर मुंबई में भी उन्होंने थोड़ा पंजाब तो बचा ही रखा है. अब जबकि मैं भी चंडीगढ़ को जानने लगी हूँ, इस शहर की गलियों की बातें जैसे मुझे भी उन गलियों में ले जा रही थी.. बहुत सारी बातों के साथ साथ मुझे लेखक की ईमानदारी ने वाकई उनका मुरीद बनाया. यह ईमानदारी कल उन्हें सुनते हुए भी दिखी और इस किताब को पढ़ते हुए भी.. आज जब लोग किसी की रचना को अपना बना लेने से नहीं झिझकते, कामिल हर जगह रिफरेन्स की बात करते हैं और पूरा क्रेडिट देते हैं. यह सिर्फ शिव कुमार बटालवी वाले प्रसंग की बात नहीं यह ‘झाई’ वाले प्रसंग की भी बात है. जब लोग छोटी सी सफलताओं को संभाल नहीं पाते, इरशाद इतने बड़े मुकाम पर पहुंच कर भी अपने इरशाद होने को बखूबी बचाए हुए हैं और शायद यही उन्हें कामिल करता है.
इस बे-उम्मीदें दौर की
मैं आख़िरी उम्मीद हूँ
ये सतर इक सच्चाई है
कोई न पढ़े तो न सही
हर गीत की अपनी कहानी है और जो कहानी है उसमें भी कितनी कविताई है... मानो दिन के अलग अलग रंग हैं हर जगह बिखरे हुए..



मंगवाते हैं हम भी, फिर पढ़ा जाएगा इसे ।
जवाब देंहटाएंज़रूर पढ़ो शुभम!!
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