आकाश का आसमानी रंग



कुछ रंग स्थायी होते हैं शायद... समय की धूप उन्हें हल्का नहीं कर पाती... चाय की घूँट ले स्याह होते आसमान को निहारते हुआ कहा था उसने...

मुझे ऐसा बिल्कुल नहीं लगता, सामने बैठी वैभवी की नज़रों में उठ रहे सवालों से थोड़ा समय माँगते हुए आकाश ने झट से अपनी अगली बात कही.. देखो न हमें आसमानी रंग देने वाले आसमान का रंग भी कैसे स्याह होता जा रहा है.. मने ये तो एक उदाहरण भर था, नज़रें घुमाओगी तो कई सारे ऐसे और उदाहरण पाओगी...

तो तुम्हे क्या लगता है रंगों का यूं बदलना ही सच है और यदि सच है तो क्या यह सही भी है...

वैभवी तुम अभी भी सच और सही को उसी चश्मे से देख रही हो...

कुछ देर का खालीपन दोनों के दरम्यान आ गया था.. हालांकि इस खालीपन के भी कई सारे आवाज़ थे, गौर करने पर जिन्हें बहुत साफ़ सुना जा सकता था...

चाय पिओगी..? कुछ भी जवाब आए उससे पहले ही, पूछ मैं किससे रहा हूँ जिसने खिताब जीता हो,  चहेड़ी न. वन का... 😊

हाहाहा वेरी फनी... जाओ बनाओ और सुनो... दूध पत्ती नहीं चाहिए मुझे

जी मैडम, आपको तो काढा चाहिए न... डोंट वरी, मैं कुछ भी नहीं भूला... अभी आया..

वैभवी आसमान को कुछ इस तरह देख रही थी, मानो आसमानी रंग  के स्याही होने के सफ़र को समझना चाह रही थी।

तभी आकाश हाथ में चाय के मग के साथ हाज़िर होता है, मैडम जी आपकी चाय...

थैंक्यू...

और बताओ, इतने प्यार से क्या देख रही थी, कोई कहानी ढूंढ ली क्या?

 तुम ‘वापसी’ को कैसे लेते हो आकाश? मतलब- मैं समझा नहीं...

मतलब तुम्हें क्या लगता है, वापसी क्या संभव होती भी है... बताओ न...

अं, वापसी कभी भी असंभव नहीं होती, पर वापसी जिस जगह पर हो रही होती है, उस जगह के बदलते रहने की पूरी संभावना होती है... अपनी ही पहली बात रंग, स्थायित्व को याद करो... जगहें बदलें न बदलें उनका स्वभाव बदलता है, उनकी स्थितियां बदलती हैं...

क्या हुआ, ऐसे क्यों देखने लगी हो?

हाँ... क्या सोचने लगी.. चौंकती हुई वैभवी ने खुद को संभालते हुए कहा.. कुछ नहीं.. कहो न... मैं समझना चाहती हूँ... समझना चाहती हूँ, असंभव को भी, और संभव की संभावना को भी...

पता है आकाश, मैंने खुद को हर दफा हर रस्ते पर अजनबी ही पाया है... हर रस्ते मुझे अनचीन्हे क्यों लगते हैं आकाश...

वैभवी रास्तों पर चलना पड़ता है उन्हें पहचानने के लिए... हम नहीं चीन्ह पाते उन्हें क्योंकि हम रास्तों पर मंजिल ढूंढते हैं... ये तो नाइंसाफी है न उन रास्तों के साथ...

मंजिल का आकर्षण हमें इतना लुभाता है कि हम रास्तों को इग्नोर ही कर जाते हैं, मंजिलों की कहानियाँ बुनते हम भूल ही जाते हैं कि इन कहानियों को दरअसल रस्ते ही पूरा करते हैं...

है कि नहीं... बताओ....

शायद...

फिर से एक चुप्पी आ गई थी.. हम किसी भी किस्से में इन चुप्पियों को नज़रंदाज़ नहीं कर सकते... इन चुप्पियों में कई सारे रंग छिपे होते हैं, चुप्पियों को पहचानें तो शायद किस्से कामिल हो जाएं और ना सुनने का हासिल हो-  अधूरेपन की टीस

आकाश को यह टीस कतई नहीं चाहिए थी, पसंद था उसे रास्तों पर भटकना, रंगों की सारी समझ उसे इन रास्तों ने ही दी थी, वह जानता था कि आकाश अपना आसमानी रंग फिर पा ही लेगा...
वो देखो...
वैभवी...
देखो न...
वही आसमानी रंग...❤

आसमान धुल चुका था। तीखी धूप इमारतों की ऊंचाई नाप रहीं थी।
वैभवी कभी इस आकाश को तो कभी आसमानी चादर ओढ़े ऊपर वाले आकाश को तक रही थी...

सही कहा तुमने आकाश...!!
आकाश ने फिर से पा लिया अपना आसमानी रंग..!!

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट