‘मसान’
बीते दिनों फिर से ‘मसान’ फिल्म देखी.. दूसरी बार या तीसरी बार, याद नहीं, पर जब भी देखा कभी नहीं लगा कि देखी हुई फिल्म देख रही हूँ.. यह फिल्म शामिल है, पसंदीदा फिल्मों की मेरी लिस्ट में.. कुछ ही दिन पहले इस फिल्म को मैं अंग्रेज़ी सिनेमा देखने के शौक़ीन अपने एक दोस्त को सजेस्ट कर रही थी.. हालांकि ऐसी फिल्मों की जानकारी हिन्दी सिनेमा देखने वालों में से भी बहुतों को नहीं होती.. मेरे उस दोस्त को मैंने इस फिल्म के अलावा ‘इति मृणालिनी’, ‘रेनकोट’ ‘मेमोरीज़ इन मार्च’ आदि फ़िल्में सुझाई थी. मेरे इस सुझाव से उसकी राय जो बनी वह यह थी कि मैं प्रेम कहानियां पसंद करती हूँ.. कुछ साल पहले ‘इति मृणालिनी’ को जब पहली बार देखा था, और कुछ दोस्तों को सजेस्ट किया था, तो जो पहली प्रतिक्रया एक दोस्त से मिली थी, वह यह कि तुम्हे यह फिल्म इसलिए पसंद आई होगी क्योंकि तुम इसमें अपना जीवन देखती हो.. प्रेम यों तो जीवन का इतना महत्वपूर्ण अहसास है कि प्रेम कहानियों को पसंद करना, प्रेम को जीना, उसे अपनी ज़िन्दगी का हिस्सा बनाना सब खासा अच्छा व ख़ूबसूरत है, पर मुझे ये फ़िल्में, मानवीय अनुभवों व व्यवहार की जटिलताओं को प्रस्तुत करने की वज़ह से जीवन के करीब लगती हैं, इसलिए सच्ची लगती हैं, अपनी लगती हैं.. ‘मसान’ फिल्म का कोई सा भी दृश्य देख लीजिए, ज़द्दोज़हद जिस भी रूप में हो यहाँ सभी मुझे जीवन की ज़द्दोज़हद ही जान पड़ती है..
तथाकथित उच्च कुल की लड़की से प्यार करने वाले लडके का अपने परिवेश की पहचान उजागर न कर पाने का द्वंद्व, एक लड़की की ज़द्दोज़हद, जिसपर पुलिस ने एक लडके की मौत और उससे भी अधिक चरित्र संबंधी आरोप लगाए हुए हैं, जिसे अपने संबंध को लेकर कोई ग्लानि नहीं है, उसके पिता की अपनी बेटी की तथाकथित सामाजिक छवि को बचाने की बेचैनी, उलझनें... एक साथ इतनी तनावपूर्ण स्थितियों को फिल्म इस कदर बांधे रखती है कि दर्शक एक क्षण भी फिल्म से मुक्त नहीं हो पाता. ऐसा नहीं है कि संजीदा विषयों या जटिल अनुभूतियों पर फिल्में बनती नहीं, पर बहुधा या तो वह डॉक्युमेंटेशन हो जाती है, या सब कुछ शामिल कर देने के बाजारवादी दबाव में अपनी पकड़ खो देती है तो कहीं अतिवाद से ग्रस्त हो जाती है.. हाल के दिनों में आई कई फिल्मों के साथ ऐसा हुआ है.. पर ‘मसान’ के साथ ऐसा नहीं है, यही वज़ह है कि यह अलहदा फिल्म है..
जीवन ख़त्म होकर जहां जाता है, वह जगह कहानी का शीर्षक ही नहीं है यहाँ अपितु कहानी के भाव का केन्द्रीय हिस्सा है.. श्मशान के देशी भाषिक रूप मसान की शुरुआत जिस तरह से होती है, वह प्रेम दृश्य है पर मोरल ब्रिगेड की भूमिका में तैनात पुलिस इसे वैश्यावृत्ति के तौर पर लेता है जिसका सामना पुरुष चरित्र नहीं कर पाता और आत्महत्या कर लेता है, वहीं फिल्म का एक मुख्य चरित्र इस पूरे संघर्ष में बड़ी मजबूती से डटा रहता है... सिर्फ स्त्री-पुरुष संबंध नहीं अपितु पिता-पुत्री संबंध, अपने शहर से बाहर काम करती स्त्री और उसके सहकर्मी का संबंध, और पहचान के इन सब दायरों से बाहर अपना बहुत कुछ खो चुके पर जीवन की जटिलताओं (जिसमे कितनी विरूपताएं भी शामिल हैं) का सामना करते दो अपरिचितों का संबंध, मानवीय संबंधों की कितनी सारी तहें मौजूद हैं इस एक फिल्म में... इतनी सारी भयावह सामाजिक विरूपताओं के बरक्स एक बच्चा, एक सहकर्मी भी मौजूद हैं जूझने वाले किरदारों के जीवन में, धुंधलाती ही सही पर उजास की छाया बनकर.. इतनी सारी कहानियां कहती फिल्म मुझे कई जगहों पर कविता सी जान पड़ती है जहां कविताई और जीवन एकमेक हैं... फिल्म खत्म हो जाती है पर उसकी थरथराहट अब भी महसूस कर पाती हूं और यह असर लंबे समय तक बना रहेगा...


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