पद्मावत (ती)


इतने सारे विवाद के बाद आखिरकार पद्मावत (ती) जब रिलीज़ हुई, तब तक उस विवाद ने मानें या न मानें फिल्म के पक्ष में माहौल बना दिया था.. सही भी था, अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए लड़ रहे लोग यकीनन उस विरोध के विरोध में खड़े होंगे जो फिल्म को रिलीज़ होने से रोक रहा था.. पर अब जबकि फिल्म दर्शकों के सामने है, तो हम उसे एक दृश्य कला रूप के रूप में ही देखेंगे, उसका मूल्यांकन करेंगे। ‘पद्मावती’ भले ही दबाव में ‘पद्मावत’ हो गई हो, पर है यह पद्मावती के रूप-सौन्दर्य पर रीझ उसे हासिल कर लेने की पुरुष मानसिकता का आख्यान ही..  स्त्री को हासिल की जाने वाली वस्तु समझने वाली इस मानसिकता को कितनी ही भव्यता से क्यों न प्रदर्शित किया जाए, मैं उस भव्यता की कायल नहीं हो पाती, जो ज़ौहर को ग्लोरिफाई करती हो, मैं नहीं हो सकती मुरीद उन भव्य परंपराओं का जो स्त्री या किसी समूह विशेष के प्रति अमनावीयता को ग्लोरिफाई करती हो, उसे लेकर गौरवान्वित होती हो ...। फिल्में, साहित्य या कि कोई भी अन्य कला रूप बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं मानसिकताओं के निर्माण में... ऐसा मैं इसलिए कह पा रही हूँ क्योंकि फिल्म को देखते हुए समांतर रूप से मेरे ज़ेहन में एक कविता और उसे लेकर हमारी उस वक़्त की समझ चलती रही जिसमें ‘कूद उठी थी यहाँ हज़ारों पद्मिनियाँ अंगारों पर’ कहते हुए इसे स्त्री की वीरता बता गौरवान्वित किया गया था और क्लास की हम लड़कियाँ अभिभूत हो जातीं कि अहा! कितनी वीर हैं हमारे समाज की स्त्रियाँ.. हम तब अपने समाज को समझने का तनिक भी प्रयास नहीं किया करती थीं शायद क्योंकि तब समाज की संरचना हमारे लिए पूर्ण थीं...इस तरह के पाठ और इसे पढ़ाने वालों ने भी हमें तब तक सवाल करना नहीं सिखाया था और हम लंबे अरसे तक परीक्षा में पूछे जाने वाले इस तरह के पाठों की व्याख्या में ओज और वीरता आरोपित कर प्रशंसा करते रहे। फिर वही बात कि स्त्रियों को ‘स्त्री’ बनाने में उन्हें ‘स्त्रियोचित’ ढालने में कितनी ही भूमिका इस तरह के पाठों की भी रही होगी। *ऐसा कहते हुए मैं स्त्री होने या स्त्रियोचित गुणों से ऐतराज़ नहीं ज़ाहिर कर रही, मुझे स्वभाव की कोमलता पसंद है, मुझे सौन्दर्य आकर्षित करता है, पर मुझे नैसर्गिक स्वभाव को ठोक पीट कर बदलने की प्रक्रिया से ऐतराज है, मुझे उस प्रक्रिया से यकीनन ऐतराज़ है, जो मुझे सिखाने की कोशिश करता रहा कि मेरा जीवन मेरे जीवन के पुरुषों के बगैर कुछ भी नहीं है, मुझे गहरा ऐतराज़ है मेरे जीवन को बेमानी मानने वाली और मेरे भीतर भी इसे लेकर सहमति बनाने की कोशिश करने वाली प्रक्रियाओं से..

एक स्त्री का सुन्दर होना बहुत ज़रूरी है हमारे समाज में पर सिर्फ तब तक जब तक कि उसके जीवन मे पति रूपी पुरुष है... एक विधवा हुई रोती कलपती स्त्री के माथे से सिन्दूर धोती औरतें, उसके हाथों से चूड़ियाँ तोड़ती औरतें हमारे गौरवान्वित समाज का ही तो हिस्सा हैं न.. पद्मावत देखते हुए मुझे अपने जीवन में देखे ऐसे दो दृश्य याद आते रहे और वाकई लगता रहा कि रोज़ इस मानसिकता से लड़ते हम अभी तक जीत नहीं पाए हैं स्त्री को शरीर में रिड्यूस कर देने वाली मानसिकता से.. इस मानसिकता ने ही विवाह के भीतर घटित अमानवीयता को, क्रूरता को अपनी रज़ामंदी दी है और बलात्कार या सामूहिक दुष्कर्म जैसी समस्याओं के समाधान के रूप मे ज़ौहर का ‘गरिमामयी’ (?) और ओजस्वी’ (?) विकल्प सुझाया है.. हमें यह भी समझना होगा..

स्त्रियों के शुचिता के नाम पर अपने जीवन को खत्म कर देने की भयावह परंपरा को ज़ौहर के नाम पर ग्लोरिफाई करने वाले तमाम पाठ हमें आसानी से मिल जाएँगे पर हैरानी है कि एक साथ तमाम स्त्रियों के साथ संबंध रखने की आज़ादी प्राप्त पुरुष के लिए एक स्त्री द्वारा ज़ौहर करने की घोषणा के साथ अपने जीवन को समाप्त करने के दृश्य को कितनी भव्यता से उकेरती है यह फिल्म...!!

आग में कूदती जीवित स्त्रियाँ, जिनमें गर्भवती स्त्रियाँ भी शामिल थीं को कितनी भी जगमागहट से क्यों न दिखाया जाए, जीवन के उल्लास से रहित ऐसे दृश्य अपनी विचारधारा में बेहद रिग्रेसिव हैं जिन्हें सेलिब्रेट करने की नहीं बल्कि क्वेश्चन किए जाने की ज़रूरत  है..


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