#क़रीबक़रीबसिंगल
क्या आप सिंगल हैं? आपका रिलेशनशिप स्टेटस क्या है? ऐसे सवालों से हममे से सभी गुज़रते होंगे, ‘क़रीब क़रीब सिंगल’ बिलकुल नया व ताज़ा जवाब होगा इन सवालों के लिए.. मेरे लिए इस फिल्म को देखना एक राहत भरे सफ़र से गुजरना था.. हर फिल्म या कि हर कला रूप अपनी प्रकृति में अलग होता है, उनसे गुज़रने का अनुभव भी नया ही होता है हर दफे... सिनेमा सिर्फ तनाव और गंभीर सरोकारों को व्यक्त कर ही श्रेष्ठ नहीं होता, जीवन की मासूमियत को बचा कर भी सुन्दर बनती हैं फ़िल्में...
सिनेमा को बदलते हुए देखना अपने आप में बहुत सुकून भरा है, ‘क़रीब क़रीब सिंगल’ भी इसी बदलते हुए सिनेमा का एक दृष्टांत है; सिनेमा, जहां कोई बनावटी चकाचौंध नहीं है, बल्कि अपनी सी हल्की रोशनी है, जहां जानी पहचानी उदासियाँ भी हैं, मुस्कान भी जहां अपनी है और उलझनें भी पहचानी हुई सी हैं, जहां होंठों की हंसी भी अपनी है तो आंखों की नमी भी अपनी ही है.. जहां अकेलापन है, प्यार की ख्वाहिश है.. नए संबंध की ओर बढ़ने, नहीं बढ़ने का द्वंद्व है जहां... ज़िन्दगी में पसरी खामोशियाँ हैं तो मोबाइल पे खिटपिटाती उँगलियों की आवाज़ है.. कुछ भी किसी और दुनिया का नहीं है.. सिनेमा को इस तरह अपना बनते देखना या कि जीवन की स्थितियों, संवादों को सिनेमा को अपनाते देखना दोनों ही बेहद सुखद है...
यदि सिर्फ फिल्म की बात करूँ तो 'क़रीब क़रीब सिंगल' एक सिंपल सी कहानी को पूरी सिंपलीसिटी के साथ प्रस्तुत करती एक बहुत ही क्यूट सी कहानी है. कहानी से भी ज्यादा यह एक सफ़र है, जिससे गुज़रना खुली हवा में सांस लेने जैसा था.. अकेलेपन से गुज़रते जूझते कई दफा मन अनजाने रास्तों पे चल पड़ता है, इस सफ़र पर चलते हुए कई बार बेतरह डर भी लगता है, पर ज़िन्दगी को मौक़ा देने के लिए हम अनजानी राहों पर भी चलने की हिम्मत जुटाते हैं.. वे अनजान राहें खुशगवार भी हो सकती हैं. दो क़रीब क़रीब सिंगल लोग जया और योगी के लिए तो यह सफ़र दोनों की ज़िन्दगी की रिक्तता को भरने वाला था..
फिल्म की कहानी जिसे कुछ लोग बहुत सामान्य कह रहे हैं, कोई इसे वन टाइम वाच कह रहा है, पर मुझे यह फिल्म अपने पूरेपन में बहुत ही एंगेजिंग फिल्म लगी.. दो अलग तरह के किरदारों के साथ को एक सफ़र में गाढा करती यह फिल्म कई स्थलों पर अपनी खामोशी में भी बात करती है..
फिल्म की परिस्थितियाँ भी अपनी है और संवाद भी और उन संवादों को निभाने वाले किरदार भी उतने ही अपने लगते हैं.. इरफ़ान तो लगातार अपने अभिनय से प्रभावित करते रहे हैं.. योगी के किरदार में भी वे उतने ही क़रीब लगते हैं, जया के किरदार में पार्वती भी अपनी अदायगी से प्रभावित करती हैं. फिल्म के गाने भी दिल को छूने वाले हैं.. ‘जाने दे’ तो पहले से ही सबकी जुबां पर चढ़ा हुआ है..
‘क़रीब-क़रीब सिंगल’ अपनी कहानी और कहन दोनों लिहाज़ से मुझे प्रेम की खूबसूरत यात्रा लगी जहां दो अकेले मन अपनी अपनी पूर्व जिंदगियों को भूलने की ज़द्दोज़हद में, अपरिचय से परिचय के रास्ते आत्मीयता की यात्रा करते हैं.. यह यात्रा देखने वालों के लिए भी काफी आत्मीय है जिससे गुज़रना एक ख़ूबसूरत अहसास को थोड़ा और अपना, थोड़ा और रियल बनाना है...
किसी भी तरह के आदर्शों से बचती, हर तरह की संकीर्णताओं से मुक्त 'क़रीब क़रीब सिंगल' एक आज़ाद सी फिल्म है जिसकी आज़ादी आपको ख़्वाब देखने का हौसला देती है और कहीं कहीं अनायास ही उन कुंठाओं से मुक्त करती चलती है जो संबंधों के बिगड़ने बिखरने से घर कर लेती हैं हमारे भीतर ...


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