प्यार भरा सलाम ❤️
कल की छोटी सी मुलाक़ात की छवि
छवि एक पूरे इंसान की जिसे इस अधूरे समाज ने नहीं स्वीकार किया और ऐसा करके उसने अपने अधूरेपन का ही परिचय दिया। यह तो सच ही है कि समाज, जिसमें मैं भी शामिल हूं, आत्मस्वीकार से डरने वाला समाज है। शायद मैं तल्ख भी हो रही हूं पर कई दफे पाती हूं कि हम झूठ के गौरव बोध में जीने वाले लोग हैं।
कई तरह के भेदभाव को हम हंस के टाल देते हैं। मुझे यह हंसी बेहद विद्रूप लगती है और लगती है हिंसा से भरी हुई। बहरहाल इस भेदभाव की विद्रूपता को परे रख इन विद्रूपताओं को चुनौती देने वाली धनंजय चौहान से आज दूसरी मुलाक़ात रही। धनंजय चौहान जिन्हें और जिनके समुदाय को हमारा संभ्रांत कहलाने वाला समाज गले लगा अपनाता नहीं है, बहुधा हिकारत से भी देखता है। सोचती हूं जो लोग गले लगा न सकें, वे प्यार कहां कर सकेंगे, कहां बना सकेंगे एक सुंदर समाज बराबरी वाला। पर बराबरी की लड़ाई तो फिर भी लड़ी जाएगी न।
प्रकृति द्वारा प्रदत्त अपनी पहचान की वजह से धनंजय चौहान को जो प्रताड़ना झेलनी पड़ी, उन सबके बावजूद खुद को इंसान के रूप में स्वीकार करवाने की लड़ाई लड़ पाना, अपने होने के गौरव को डिगने न देना, बहुत ही मुश्किल है. हां यह करना किसी आम इंसान के वश की बात नहीं है, इसके लिए एक विलक्षणता चाहिए ही है।
अपने होने का उत्सव प्राइड के नाम से पिछले कई वर्षों से सेलिब्रेट कर रही है इनकी संस्था! मुझे पता है कि आप लोगों का संघर्ष बहुत लंबा है और मुश्किल भी... आपके संघर्षों को जीत में तब्दील होना ही है, इस समाज के ज़िंदा होने का यह भी एक सबूत होगा। बहुत कुछ लिखना था पर अभी आपको सलाम करने का दिल कर रहा है!!
लड़ते रहिए, जीतते रहिए ❤️


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