पीहू को देखते हुए...


पीहू कोई फिल्म नहीं है और कम से कम इसे वे लोग तो न ही देखें जिनके लिए फिल्में महज़ मनोरंजन का ज़रिया हो, वे लोग भी इससे दूर ही रहें जिन्होंने जीवन की संवेदनाओं को महसूसने की क्षमता खो दी है। पीहू को देखना दरअसल किसी त्रासदी का साक्षात्कार करना है। इसे देखना एक ऐसे भीषण दर्द से गुज़रना है जो बेशक आपका नितांत व्यक्तिगत न हो, पर फिर भी आपको दहला देता है। यह फिल्म एक ऐसी त्रासदी से गुज़रना है जहाँ सुकून का एक छोटा सा पल भी नहीं है। गीता श्री
मैम ने इस फिल्म के बारे में अपनी बात रखते हुए ठीक ही लिखा है कि यह फिल्म आपके विज़ुअल हैबिट को बदलती है और यह सिनेमा के पुराने आस्वाद से मुक्ति की तरह भी है।

रात का शो, गिने चुने दस लोग और अपने आस पास बिखरी मृत्यु के बीच एक छोटी सी मासूम बच्ची पीहू के रूप में ज़िन्दगी। जन्मदिन की रात के बाद हुई सुबह जिसने उसकी पूरी ज़िन्दगी बदल दी। मृत माँ के बगल में सोयी प्यारी पीहू जब आँख खोलती है तो जो जीवन उसके सामने होता है, वह सुबह के उजास से उजला नहीं हो जाता..  नलके से गिरता पानी, गैस की जलती लौ, जला गर्म प्रेस, गीज़र का खुला स्विच सब कुछ कितने सन्नाटे मॆं अपनी गति से चलता रहता है पर धड़कनें बढ़ती हैं हमारी, दिल दहलता है हमारा, चीख निकलती है हमारी, फोन की घंटी बजने पर मानो हम पीहू की बात सामने वाले तक पहुँचा देना चाहते हैं। डोर बेल की घंटी पर लगता है कि हम किसी तरह दरवाज़ा खोल दें।

ज़िंदगी के भीतर संबंधों के बनते बिगड़ते गणित ने ज़िंदगी का रंग ही बदल दिया हो जैसे। मृत्यु के ऊपर लेटी ज़िंदगी उसे बचा नहीं सकी।  मरी माँ की चोट पर मलहम लगाती बच्ची, उसे ब्रेड खिलाती बच्ची, अपने को सजाती बच्ची, अपने लिए खाने का इंतज़ाम करती बच्ची, खिलखिलाती बच्ची, रोती बच्ची और फिर कड़वी दवा खा सो जाती बच्ची...  यह बच्ची अपनी हर हरकत से ज़िंदगी से जुड़ी हुई है। एक अजीब सी अनाम दौड़ में भागते दो लोगों द्वारा अपने बीच बनाई एक क्रूर गहरी खाई के बीच एक सुन्दर ज़िन्दगी का स्वप्न खत्म हो जाता है।

सुन्दर, रोमानी, मासूम कल्पनाओं, असाधारण भव्यताओं को दिखाने वाले सिनेमा के बीच पीहू सिनेमा को भयानक यथार्थ की ज़मीन पर ले आती है। समय का क्रूर सच, जहाँ हमारे निर्णय गलत हो जाते हैं और जिसे हम झेल नहीं पाते, जहाँ कुछ खास पाने की चाहत में अपने लिए महज़ अकेलापन हासिल करते हैं जिस तरह से हमॆं फिल्म में दिखाया गया है, वह हमें सचेत करता है..

कहानी जिस बच्ची के जन्मदिन को कलात्मक तरीके से दिखाते हुए शुरू होती है, उसी बच्ची के ‘मैं कितना सुन्दर घर बना रही हूँ’ की आवाज़ पर खत्म होती है।

क्या हम अपनी अन्धी अनाम दौड़ से बाहर निकल थोड़ा समय उन खाइयों को कम करने में लगाएँगे  जिसने ज़िंदगी से जीवन को ही छीन लिया है। ज़िंदगी से रहित भव्यताएँ खोखली होती हैं, उन्हें पाकर ज़िंदगी को खो देना दरअसल सब कुछ खो देना ही है। क्या हम थोड़ा ठहर कर उस ज़िंदगी को नहीं बचाएँगे, क्या हम अपने लिए, अपनी आने वाली पीढियों के लिए थोड़ी सी ज़िंदगी नहीं बचाएँगे।

#पीहू

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