जब बोलना ज़रूरी हो गया...
2016 का वह साल था। लोगों ने आकर पूछना शुरू कर दिया, ओ तुम जे एन यू से हो? वहां तो आतंकवादी रहते हैं। हालांकि यह पूछना अब भी जारी है
अच्छा तुम जे एन यू से हो, आर यू वर्जिन? वहां तो लड़कियां... (अजीब सी नज़रों वाली हंसी पर हर बार यह वाक्य अधूरा छोड़ दिया जाता) यह नज़र और यह सवाल आज भी जारी है।
हालांकि इन सवालों और गालियों का दौर थमा नहीं है पर मुझे इस बात की शर्मिंदगी कभी नहीं हुई। मैं आज भी खूब गर्व से भर जाती हूं, डी यू और जे एन यू में गुजारे अपने समय पर।
ये सवाल मेरे आस पास के लोग, मेरे दफ्तरों के लोग द्वारा पूछे गए। मैं उनकी शैक्षिक योग्यताएं नहीं जानती पर नौकरियों में आने वाले लोगों के पास कुछ डिग्रियां तो ज़रूर होती हैं।
अब एक बात ये कि डिग्रियों वाले लोग मुझे नहीं पता किस आर्थिक क्लास से आते हैं पर पता नहीं क्यों मुझे लगता है कि इस समाज में व्यक्ति का इकोनॉमिक्स उसका क्लास डिसाइड करता है (हालांकि कास्ट और जेंडर का डिवीजन भी पैरेलल चलता रहा है)
टैक्सपेयर के पैसे की चिंता इस क्लास को सबसे अधिक जे एन यू को लेकर ही हुई। हमारे देश की सरकारें हमें लूटती रहीं। लूट के फरार हुए उद्योगपतियों पर इस देश के टैक्सपेयर ने चिंता नहीं ज़ाहिर की।
देशद्रोही घोषित कर दिए उसी विश्वविद्यालय से आती हूं पर टैक्स तो मैं भी दे ही रही हूं। न सिर्फ अपने वेतन से बल्कि बाजार से खरीदी गई हर चीज पर अप्रत्यक्ष रूप से भी।
अब सवाल कि कोई मंहगे फोन के साथ शिक्षा के निःशुल्क होने की बात कैसे कर सकता है। अब इस दिक्कत का मैं क्या जवाब दूं। हालांकि ताज्जुब है कि लड़ते हुए, पिटते हुए सभी विद्यार्थी उन्हें एक धनाढ्य वर्ग के लगे। हालांकि उनके इस विरोध को स्वीकार भी कर लूं तो मुझे तो यह एक खूबसूरत सी बात लगी कि जिनके पास संसाधन है, वे उन विद्यार्थियों के हक में खड़े हैं जो संसाधन रहित हैं। मैं यह सारा कुछ आज खुद एक महंगे फोन से टाईप कर रही हूं और हां मैं पूरी तरह क्वालिटी और फ्री एजुकेशन के साथ हूं। और यह बात तो शायद सबको पता होगी कि इस देश में गरीबी की क्या स्थिति है। सरकार द्वारा निर्धारित बीपीएल की परिभाषा से भी हमारे देश की तकरीबन 29% आबादी गरीबी रेखा के नीचे है। (https://m.timesofindia.com/india/New-poverty-line-Rs-32-in-villages-Rs-47-in-cities/articleshow/37920441.cms) और गरीबी रेखा के नीचे की जो परिभाषा दी गई है मुझे नहीं लगता कि वह जीवन जीने के लिए पर्याप्त होती है। यह बात भी पता होगी सभी को कि हमारे देश के परिवार लड़कियों को शिक्षा दिलाने के कितने पक्षधर हैं। मेरे से ऊपर उल्लिखित ऊल जुलूल सवाल पूछने वालों में से ही कईयों ने कहा था कि तुम तो नौकरी नहीं भी करोगी तो चलेगा। उनके इस रिमार्क्स से मैं उनकी सोच को तब भी समझ पाती थी। बस बहस का मूड नहीं था।
और हां जो देश अपने नागरिकों की शिक्षा तक को एफोर्ड नहीं कर सकता वह देश विकास की कौन सी इबारत गढ़ेगा मुझे नहीं पता। इस देश में बच्चे इलाज के अभाव में मर जाते हैं। मुझे यह भी नहीं पता कि सरकारों की क्या ज़िम्मेदारी होती है पर इतना तो तय है कि शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं तक बिना बाधा सबकी पहुंच होनी ही चाहिए क्योंकि इनके अभाव में हम जीवन को/ समाज को बेहतर नहीं बना सकते।
अच्छा कुछ चीजें छूूट गई थी, बात यह भी हो रही है, कि दूसरे विश्वविद्यालयों में महंगी फीस है वहां कोई कुछ नहीं कह रहा, तो भाई साब आप क्यों कह रहे हैं। आप नौकरी क्यों नहीं करते। बुढ़ापे तक पढ़ क्यों रहे हैं। इस सवाल के जवाब में मैं पहले ही एक पोस्ट शेयर कर चुकी हैं। बात दरअसल यह है कि जब यूजीसी की नॉन नेट फेलोशिप बंद की गई थी तब भी यही स्टूडेंट यूजीसी के बाहर प्रदर्शन कर रहे थे, जब निर्भया वाला मामला हुआ था, तब भी ये विद्यार्थी बाहर थे सड़कों पर। विश्वविद्यालय की कमियों को गिनाने के चक्कर में, प्रशासन को सही बताने की ज़िद सही नहीं है।
और हॉस्टल मैन्युअल के समय निर्धारण के विरोध को जो लोग चटखारे लेकर बता रहे हैं वे बस अपनी मानसिकता बता रहे हैं। जिस समाज के लिए सड़कें तक पुरुषों के लिए एक खुली जगह हो जिस पर वह कहीं भी रुककर खड़ा हो सकता है।अन्य लड़कों से बात कर सकता है या यूं ही खड़ा खड़ा नज़ारा देख सकता है।
इसके विपरीत लड़की के लिए सड़क एक स्थान से दूसरे स्थान तक कम-से -कम समय में जाने का माध्यम है-एक खुली यानि ऐसी जगह नहीं है जिसका उपयोग और अर्थ वह लड़के की तरह ख़ुद तय कर सकती हो। (पढ़िए चूड़ी बाज़ार में लड़की-कृष्ण कुमार)
उसके मुंह से जे एन यू की लड़कियों के लिए अश्लील टिप्पणी सुनकर अचंभा नहीं होता।


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