सिलसिला अभी खत्म नहीं हुआ...


एक दिन अचानक से उसके फोन की घंटी बजी थी.. उसके नाम की थोड़ी पहचान करता और शायद अपनी थोड़ी सी पहचान बताता एक मैसेज उसके फोन की स्क्रीन पर चमक रहा था.. किसी अप्रत्याशित घटना की संभावना मन में सोच बहुत सी बातों को अनदेखा करने की आदत न चाहते हुए भी बन ही गई है इन दिनों, पर उसी के साथ छोटी छोटी बातों पर बहुत सोचना भी उसकी आदतों में शुमार हो चला था... अब, सोच की जिस दुनिया में वह जीती थी वहाँ दावे के साथ यह तो नहीं कहा जा सकता कि यह सब उसके लड़की होने की वज़ह से ही था पर हाँ उसके बारे में इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि वह थी ही ऐसी, थोड़ी झल्ली सी.. बहरहाल उस मैसेज़ के बाद जाने कितने ही और मैसेज़ आए और बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया.. बिना मुलाक़ात किसी अपरिचित से परिचय का सिलसिला भी शायद शुरू हो चुका था.. कहा नहीं जा सकता कि वह झल्ली सी बावली लड़की जिसे परिचय समझ बैठी थी, क्या वाक़ई वहाँ पहचान का कोई रिश्ता बन रहा था या फिर शुरुआत में नएपन का अहसास दिलाने वाले उस सिलसिले को यों ही अचानक से खत्म हो जाना था एक दिन... और तभी शांत पड़े उसके फोन की घंटी फिर से बज उठी, स्क्रीन पर फिर से चमकने लगा उसका मैसेज़, शायद यह बताता हुआ कि सिलसिला अभी खत्म नहीं हुआ...

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