अजनबी शहर में अपनी सी मुस्कान वाला वह चेहरा..



उस दिन बस स्टॉप पर काफी भीड़ थी| लगता था काफी देर से कोई बस नहीं आई थी| बस का इंतज़ार करते लोगों की भीड़ में मेरा इंतज़ार भी शामिल हो गया| थोड़ी ऊब, थोड़ी खीझ के साथ इंतज़ार करती मैं– पर इंतज़ार को भला मेरे उस ऊब और खीझ से क्या लेना देना.. तभी अपने ठीक बगल में मैंने एक मुस्कुराते चेहरे को महसूस किया, वह चेहरा मुझे बेहद मासूम सा लगा पर थोड़ी ही देर में खीझ भरे मेरे इंतज़ार ने मेरा ध्यान उसकी मासूम मुस्कराहट से बस के इंतज़ार की ओर मोड़ दिया..

'एक अजनबी शहर में भी कभी कभी कुछ अपने से लगने वाले चेहरे दिख ही जाते हैं'..उसने कहा था अपनी उसी मासूम मुस्कराहट के साथ.. 'पर वे उस शहर के लिए ज़रूर ही अजनबी होते होंगे'.. कहते हुए मैंने उसकी बात में अपना पक्ष जोड़ दिया... 'मेरी बस आ गयी' कहते हुए मैंने उस अपने से अजनबी से विदा ली... बदले में फिर से उसकी मुस्कराहट मिली, वही मासूम वाली, जो इस बार मेरे चहरे पर भी आ गयी थी... तब कहां पता था, इसी मुस्कराहट में किसी सुन्दर सी कहानी के बीज छिपे होंगे...

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