वो बूँदें बारिश की...



लगता है बादल और सूरज लुकाछिपी का खेल खेल रहे हैं, मैंने हँसते हुए कहा था.. तुम भी न, एक तो इतना इरिटेटिंग मौसम हो रहा है और तुम्हें इसमें लुकाछिपी का खेल दीख रहा है.. कितना चिड़चिड़ करते हो तुम यार.. खेल ही तो रहे हैं वे.. सोचा है तुमने कभी कितना ऊब जाते होंगे वे, रोज़ अलग अलग आते जाते, तो उन्होंने आज मिलने का प्लान बनाया हमारी तरह, तुम और तुम्हारी इमैजिनेशन.. क्या इमैजिनेशन, देखना अभी बादल जीत जाएगा और खूब सारी बारिश होगी, क्या बोलते हो..? तुम न कुछ भी बोलती रहती हो, बकबक बकबक, थकती नहीं क्या... और तुम पकते नहीं क्या कभी हर वक़्त यों सड़ू सी शक्ल वाली चादर लपेटे ... पता है, कुछ रिश्ते बारिश की बौछार की तरह होते हैं, अचानक से आपको भीतर तक भिगो जाते हैं, पर उतने ही अचानक से चले भी जाते हैं, उसने कहा था थोड़ी उदासी के साथ, मैं हैरान थी और तभी अचानक से बाहर बारिश की तेज़ बूँदें गिरने लगीं.. मैंनें कहा लो जीत गया बादल, चलो न हम भी शामिल होते हैं उसकी जीत के जश्न में... और फिर हम दोनों उस बौछार में भीगते रहे देर तलक ... वो बौछारें गायब कहां  हुईं चुपचाप, वो तो हमें आज भी भिगोती रहती हैं, हैं न...

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