एक पुरानी कविता..



हे महामानव!
तुम्हें लगता है कि,
तुमने बहुत खूब समझा है हमें,
और तुम्हारी रचनात्मकता सबूत है,
तुम्हारे इस गुमान का
तुमने की हैं काफी कविताएं,
वाकई हमारे सौंदर्य पर,
पर,
सौंदर्य बस वही तो है,
तुम्हारी नजर में,
जो भरता है,
आकर्षण तुममे
तभी तो,
तुमने लिखा,
मेरे शरीर पर,
हाथों की चूड़ियों पर,
पैरों के पाजेब पर,
जो तुम्हें संगीतमय लगती हैं,
और मुझे बेड़ियाँ
तुमने खींचे चित्र,
रसोई में गोल-गोल रोटियों के लिए,
बेलन घुमाती मेरी कलाई के,
यहाँ भी तुम्हारे लिए मेरा सौंदर्य,
मेरे काम की सुघड़ता पर था,
सच में,
बड़े खूबसूरत चित्र निकाले हैं,
तुमने,
मेरे लम्बे-लम्बे काले बालों के,
मुस्कुराकर तुमसे मिलती 'मैं',
जरा सकुचाती 'मैं',
के चित्र,
तो वाकई बड़े गजब के,
बनाये हैं तुमने,
पर हे नियंता,
हाथों में नीतियों की पोथी की जगह,
अधिकार थमाते,
आँखों में सकुचाहट की जगह,
स्वत्व का गाढ़ा रंग भरते,
तो मानती मैं,
कि हाँ,जाना है तुमने जरा भी
अगर बस,
देखना है हमें,
अपनी ही नजर से तुम्हें,
तो दावा न करो,
हमें समझने का तुम,
क्योंकि अब हमें,
तनिक भी नहीं लुभाते,

रंगीन मुलामियत भरे तुम्हारे ये खोखले दावे!!!

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