मैं उस सफर पर जाना चाहती हूँ...



कभी कभी ही महसूस करती हूँ बदलाव की हवा को ... यह भी कि हम उसी सफर के राही कहाँ रहे, रस्ते बदल गए हैं, पर कुछ चीज़ें अब भी ठहरी हुई हैं और शायद कहीं हम भी उस ठहराव के आगे रोक लेते हैं अपने कदम, बंद कर लेते हैं खिड़कियाँ, सच कहूँ तो तनिक भी अच्छा नहीं लगता, न कदमों का ठिठकना, न बंद खिड़कियों वाले जीवन को जीना... पीछे मुड़कर देखती हूँ तो लगता है कि कितने रास्तों से गुज़रते हुए कहाँ से कहाँ आ गई हूँ, थोड़ा बहुत कुछ बेहतर (?) होता गया तो बहुत कुछ वहीं उसी रूप में भीतर बैठा रहा.. कंडिशनिंग को समझ तो पाई पर उस कंडिशनिंग को जीत कहाँ पाई हूँ अब तलक... उसी कंडिशनिंग ने भीतर बहुत डर बिठा दिया है। जब रात में उस कंडिशनिंग से लड़ हिम्मत बटोर सड़कों पर अकेले चलती हूँ न, सड़कों पर चलती बड़ी छोटी गाड़ियों में बैठे लोग उस हिम्मत को तोड़ने की कितनी कोशिश करते हैं, हम उनसे हिम्मत पाने की कोई उम्मीद नहीं रखते, पर क्या उनकी आँखों के लिए हमें सड़कों पर पूरी सहजता और आज़ादी के साथ चलता देख सकना भी इतना मुश्किल है.. हमारे लिए रास्ते बेशक मत बनाइए, हम खुद ढूँढ़ेंगे अपने रस्ते, भटकेंगे निरुद्देश्य यों ही, हो सकता है हम कहीं न पहुँचें, पर इस भटकन में भी हम अपने भीतर की यात्रा में ज़रूर कहीं पहुँचेंगे, शायद खुद तक...  मैं यह सोच कर ही खुश हुई जा रही हूँ, कि वह भटकन कितनी खूबसूरत होगी जहाँ मैं हर कंडिशनिंग को जीत दूसरों की धारणाओं से मुक्त हो खुद से मुलाक़ात कर सकूँगी.. वह सफर कितना यादगार होगा, जब हम दूसरों के नज़र के चश्मे से बेपरवाह हो, बस खुद के लिए बाहर निकलेंगे.. मैं उस सफर पर जाना चाहती हूँ..

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